गीता का रहस्या जीवन मै ही घुला मिला है! भक्ति मै भावना महत्वपूर्ण होती है!

गीता का रहस्या जीवन मै ही घुला मिला है

चैतन्य महाप्रभु जग्गनाथपुरी से मथुरा जा रहे थे, हरे कृष्ण मन्त्र का संकीर्तन करते हुए उनके साथ भक्तो का एक दल चल रहा था. रास्ते मै कुछ समय के लिए वे बनारस मैं भी रुके एक सुबह वह अकेले ही गंगा के किनारे घूमने के लिए निकले, उन्होंने एक स्थान पर देखा की गंगा के किनारे एक साधक गीता पाठ कर रहा है. वह भाव विभोर था उसकी आँखों से आंसू की धरा बह रही थी

महाप्रभु चुपचाप जाकर उसके पीछे खड़े हो गए पाठ समाप्त कर जब साधक ने पुस्तक बंद की तो महाप्रभु ने सामने आकर पूछा देव लगता है की आप संस्कृत नहीं जानते , क्योंकि आपका उच्चारण शुद्ध नहीं हो रहा था , पर गीता का ऐसा कौनसा अर्थ आप समझते है जिसके सुख मैं आप इतने विभोर हो रहे थे ?

साधक ने उन्हें दंडवत प्रणाम किया और फिर बोला भगवन मै संस्कृत क्या जानू , और गीता के अर्थ का मुझे क्या पता ?

जब इसे पड़ने बैठता हु , तो मुझे लगता है कि कुरुक्षेत्र के मैदान मैं दोनों और सेना खड़ी है . सेना के बीच मै चार घोड़ो वाला रथ खड़ा है , रथ के भीतर अर्जुन दोनों हाथ जोड़े और रथ के आगे घोड़ो कि रास पकड़े भगवन श्री कृष्ण बैठे है.

भगवन अर्जुन से कुछ कह रहे है , मुझे यह स्पष्ट दिखता है . भगवन श्री कृष्ण और अर्जुन कि और देखकर मुझे प्रेम से रुलाई आ रही है .

महाप्रभु ने पूछा की बिना परिचय के आपने मुझे प्रणाम क्यों किया ? साधक ने कहा अभी तो गोविन्द के दर्शन किये है उन्हें कहते सुना है वासुदेव : सर्वमिति . यह सुनकर चैतन्य महाप्रभु ने उस साधक को उठाकर गले से लगाया और कहा , देव ! तुम्ही ने गीता का सच्चा अर्थ जाना है और गीता का ठीक पाठ करना

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