Bhagwat Geeta में लिखा है kalyug के अंत का सच

bhagwat geeta -अक्सर जब गलती करते थे  तब हमारे बुजुर्ग कहते ,कि कलियुग आ गया है कोई किसी की सुनने का नाम ही नहीं लेता। हां  सच है कि कलियुग आ गया है  । इसकी  भविष्यवाणी भागवत पुराण में कर दी गई थी जिसके लक्षण आए दिन समाज में दिखाई पड़ते है । भागवत पुराण 5000 वर्ष पुराना  अहम ग्रथों में से एक है । इस ग्रंथ में जीने के तरीके , कर्म  , पाप ,पुण्य और आदर्श जैसी महत्वपूर्ण चीजों के बारे वर्णन है । बता दें कि महाभारत के दौरान  कृष्ण ने अर्जुन को कई शिक्षाएं दी थी  जिनसे मैं और आप हरदम सीख सकते है  । कृष्ण के दिए ज्ञान से अर्जुन ने महाभारत जीत ली थी । चलिए बताते है सारी अहम और दिलचस्प बातें ।

Bhagwat Geeta- श्लोक 1-
ततश्चानुदिनं धर्मः सत्यं शौचं क्षमा दया ।
कालेन बलिना राजन् नङ्‌क्ष्यत्यायुर्बलं स्मृतिः ॥

कृष्ण ने द्वापर युग के अंतिम दिनों में बोला था जो आज भी अंतिम सत्य है । जैसे कि इस श्लोक में लिखित है कि धर्म, सत्यवादिता, स्वच्छता, सहिष्णुता, दया, जीवन की अवधि, शारीरिक शक्ति और स्मृति सभी दिन-ब-दिन घटती जाएगी। हर वक्त लोग खुद से , दुसरों से और अपने से झुठ बोलते रहते है जिसकी कोई जरुरत तक नहीं होती । ऐसे ही अन्य चीजों को भी अनाश्यक रुप से करते रहते है ।

Bhagwat Geeta-श्लोक 2-
वित्तमेव कलौ नॄणां जन्माचारगुणोदयः ।
धर्मन्याय व्यवस्थायां कारणं बलमेव हि ॥

  फिल्मों में  हम देखते है कि कानून अंधा होता है ।   ऐसा कृष्ण ने पहले  ही कह दिया था जिसके प्रत्यक्ष  उदाहरण हमारे सामने  है ।   अहम  पदों पर  बैठे लोग ही कानून पर राज कर रहे है क्योंकि  उनकी जेब में  धन की कमी नहीं है ।  इसलिए जिसके पास जितनी लक्ष्मी  होती है वो उतना ही  गुणी कहलाता है   ।

Bhagwat Geeta-श्लोक 3-
दाम्पत्येऽभिरुचिर्हेतुः मायैव व्यावहारिके ।
स्त्रीत्वे पुंस्त्वे च हि रतिः विप्रत्वे सूत्रमेव हि ॥

अर्थ- आज हर मोड़ पर धोखा है । 24 घंटे लोग एक-दुसरे को लूटने में लगे रहते है । अब तो लोगों  ने भी मान लिया है कि सफलता का पहला पड़ाव छल है । एक जमाना था जब लोग ब्राह्मण को देवताओं जैसी इज्जत बख्शा करते थे । वहीं कलियुग में  कोई भी एक पीला धागा पहनकर खुद को पंडित बताता फिरता है । उपर से युवाओं में एक नया चलन चल रहा है जहां बिना सात फेरे लिए स्त्री- पुरुष स्वेच्छा से साथ रहते है  ।

Bhagwat Geeta-श्लोक 4-
लिङ्‌गं एवाश्रमख्यातौ अन्योन्यापत्ति कारणम् ।
अवृत्त्या न्यायदौर्बल्यं पाण्डित्ये चापलं वचः ॥

आम आदमी की  जिंदगी में आधा वक्त  स्वार्थ की  छलनी में पिसता  है कोई ना कोई व्यक्ति उसे अपने छल का शिकार बनाने की फिराक में रहता  है ।   अगर वो आदमी गलती से अदालत की देहलीज पर न्याय की मांग करता है तो स्वार्थ , घूस और स्वार्थीयों के चलते  न्यायलय से भी हाथ खाली लौटना पड़ता है । सबसे अजीब बात ये है कि  ऐसे लोगों को लोग विद्वान तक बुलाते है ।

Bhagwat Geeta-श्लोक 5-
क्षुत्तृड्भ्यां व्याधिभिश्चैव संतप्स्यन्ते च चिन्तया ।
त्रिंशद्विंशति वर्षाणि परमायुः कलौ नृणाम्

  देखा जा रहा है कि लोगों की जीने की उम्र कम होती जा रही है । पहले इंसान 80 -90 वर्ष तक जीता था लेकिन अब 20 से 30 तक मुश्किल से जी रहा है । इसके पीछे का कारण लोगों की बदहाल जिंदगी , या फिर कई प्रकार की चिंताओं से घिरा होना । इसलिए बीमारियों के शिकार हो जाते है ।

Bhagwat Geeta-श्लोक 6-
दूरे वार्ययनं तीर्थं लावण्यं केशधारणम् ।
उदरंभरता स्वार्थः सत्यत्वे धार्ष्ट्यमेव हि ॥

खबरों में आता है कि कोई बच्चा  अपने माता-पिता पर अत्याचार कर रहा है ।   इस कलियुगी माहौल में तीर्थों की पूजा करता  है लेकिन माता-पिता की सेवा नहीं करता ।  सुंदरता के नाम पर लंबे लंबे बाल रखे जाते है । लेकिन पेट भरने के नाम पर गरीबी का हवाला दें दिया जाता है । इसी कलियुग की भविष्यवाणी की गई थी  ।

Bhagwat Geeta-श्लोक 7-
अनावृष्ट्या विनङ्‌क्ष्यन्ति दुर्भिक्षकरपीडिताः
शीतवातातपप्रावृड् हिमैरन्योन्यतः प्रजाः ॥

बदलते  वक्त में पर्यावरण  भी बदल रहा है ।कलियुगी माहौल में कहीं ज्यादा बारिश तो कही बारिश का नामोनिशान भी नहीं । कहीं कड़ाके का पाला पड़ रहा है तो कहीं भीषण गर्मी । इस कारण जानवर से लेकर  इंसान तक तंग है ।

Bhagwat Geeta-श्लोक 8-
अनाढ्यतैव असाधुत्वे साधुत्वे दंभ एव तु ।
स्वीकार एव चोद्वाहे स्नानमेव प्रसाधनम् ॥

वक्त क्या बदला ,  इंसान ने  प्राथमिकताएं  बदल ली । अब  मेहनत से बढ़कर धन को प्रधानता दी जा रही है । जिन लोगों के पास पैसा नहीं होता है उन्हें बेकार , अशुद्ध और धर्म का पालन ना करने वाला मानते है । लोगों के बीच शादी के मतलब में  भी तब्दीली आई है जैसे आज कल जोड़े  छोटी छोटी बातों पर तलाक जैसा कदम उठाने में संकोच नहीं करते  है । जबकि दो लोगों के बीच शादी  समझौते से बढ़कर होती है ।लोगों में अजीब सी धारणा बन गई है कि स्नान करने से आत्मा शुद्ध हो जाती है लेकिन ऐसा नहीं है ।

Bhagwat Geeta-श्लोक 9-
दाक्ष्यं कुटुंबभरणं यशोऽर्थे धर्मसेवनम् ।
एवं प्रजाभिर्दुष्टाभिः आकीर्णे क्षितिमण्डले ॥

इंसानो की एक खासियत है कि वो सामने कुछ और होते  है पीछे कुछ और । ऐसे ही धर्म के नाम पर करते है । पहले पाप करते है फिर धर्म कर्म के नाम पर अच्छा दिखावा करते है । धन के लिए लोग एक-दुसरे को मरने मारने से भी हिचकते नहीं है । जिससे पता चलता है कि कैसे भ्रष्ट लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है ।

श्लोक 10-
आच्छिन्नदारद्रविणा यास्यन्ति गिरिकाननम् ।
शाकमूलामिषक्षौद्र फलपुष्पाष्टिभोजनाः ॥

कभी कभी ऐसा लगता है कि हम आगे  बढ़ने की बजाय  पीछे बढ़ते जा रहे  है क्योंकि जैसे पहले लोग रास्ते पर समय बिताते थे वैसे ही आज दिन प्रतिदिन लोग सड़कों पर जीवन  गुजार रहे । और खाने के नाम पर रोटी की जगह मांस , पत्ते , जड़ और फूल खाने को मजबूर है ।

 

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