जानिए रहस्य कमलनाथ महादेव मंदिर का जहाँ भगवान शिव से पहले पूजे जाते है रावण

रावण को नीति, राजनीति और शक्ति का महान् पंडित माना जाता था  क्योंकि उसकी तपस्या की धाक  भगवान से लेकर देवी- देवताओं  समेत में मशहूर थी । इसी का उदाहरण है कमलनाथ महादेव मंदिर । जहां पर महादेव से पहले रावण को पूजा जाता है । ये जानकर  आपको ज्यादा आश्चर्य होगा कि यह मंदिर कहीं और नहीं भारत में ही स्थित  है । हां , यह राजस्थान के उदयपुर जिले की  झाडौल तहसील में आवारगढ़ की पहाड़ियों में स्थापित है । पुराणों के मुताबिक , इस प्राचीन मंदिर की स्थापना खुद लंकापति  ने की थी । इसके पीछे का कारण है कि महादेव को  प्रसन्न करने के लिए रावण ने अपना शीश भगवान शिव को एक अग्निकुंड  में त्याग दिया था । जिसके उपहार में भगवान शिव ने जो दिया वो तो और नायाब था वो था रावण की नाभि के लिए  अमृत कुण्ड । इसीलिए रावण को शिव  से  पहले पूजा जाता है  । तो है ना अजब ।

पुराणो में वर्णित कमलनाथ महादेव की कथा :

कहने को तो कहानी लगती है लेकिन सच्चाई की पुष्टि खुद पुराण करते है कि कैसे भगवान शिव को  खुश करने के लिए रावण ने रात-दिन एक कर दिए थे । एक बार की कहानी है जब  लंकापति ने भगवान शिव को  लंका ले जाने के लिए कठोर  तपस्या की थी कठोर तप को देखकर महादेव खुश हुए और रावण की  मनोइच्छा को मान लिया  । भगवान शिव ने दशानन से कहा कि  इस शिवलिंग को लंका में स्थापित कर देना  लेकिन शर्त ये  रख दी कि अगर ये शिवलिंग लंका से पहले कही स्थापित हो गया तो वहां  से शिवलिंग टस से मस नहीं होगा  और हुआ भी ऐसा ही क्योंकि कैलाश पर्वत से लंका का रास्ता  काफी लंबा था और  रावण रास्ते में ही थक गया।   लंकापति ने  थोड़ी  राहत  की सांसे लेने के लिए शिवलिंग धरती पर रख दिया । रावण ने राहत की सांसे लेने के बाद  शिवलिंग को उठाने भरपूर कोशिश कर ली लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी और शिवलिंग वहां स्थापित हो गया ।

इस गलती के बाद  भी दशानन पीछे नहीं हटा ,   उन्होंने लगातार भगवान शिव का साढ़े बारह साल तक तप किया  । बता दें कि  रावण महादेव को तप के दौरान  सौ कमल के पुष्पों के जरिए पूजन करते थे  तो इस बीच भगवान ब्रह्मा को लगा कि महादेव प्रसन्न होने वाले है तो उन्होंने तप में व्यवधान डालने के लिए  कमल के पुष्पो की कमी कर दी । रावण भी कम नहीं था  रावण ने ब्रह्मा के मंसूबो पर  पानी फेरने के लिए अपना शीश काटकर भगवान  शिव को अग्नि कुण्ड में समर्पित कर दिया। भगवान शिव ने  रावण की भक्ति  को देखते हुए  वरदान स्वरुप  उसकी नाभि में अमृत कुण्ड की स्थापना कर दी। तो ऐसे इस प्राचीन मंदिर को   कमलनाथ महादेव के नाम से जाना जाता है । यही से रावण ने रावण संहिता का अविष्कार किया |

आवरगढ़ की पहाड़ियों का ऐतिहासिक महत्त्व :

आवरगढ़ की पहाड़ियों के बारे में आपने पढ़ा होगा ,नहीं  पढ़ा तो आज पढ़ ले । बात  सन 1576 की है जब अकबर ने चितौड़ पर अचानक से आक्रमण कर दिया था तब  हल्दी घाटी के संग्राम में अकबर और महाराणा प्रताप के बीच खतरनाक  युद्ध चल रहा था आवरगढ़ के किले ने  महाराणा प्रताप की सेना को  युद्ध  के दौरान सुरक्षा दी थी साथ ही घायलों के उपचार में भी किले का इस्तेमाल किया गया।  इसी युद्ध में महान झाला  वीर मान सिंह ने महाराणा प्रताप के प्राण बचाते हुए बलिदान दिया था । इसकी नींव महाराणा प्रताप के दादा के दादा महाराणा ने  रखी थी  बता दें कि झालौड़ से 15 किलोमीटर की दूरी पर आवरगढ़ की पहाड़ियों में स्थित है ।

झालौड़ में सर्वप्रथम यही होता है होलिका दहन :

होली  के अवसर पर एक नई  बात भी बताते है कि सन 1577 में   झालौड़ के आवरगढ़ पहाड़ी में महाराणा प्रताप ने होलिका दहन किया था ।  यहां पर आज भी  कमलनाथ महादेव मंदिर के पुजारी भी होलिका दहन में शरीक होते है । साथ ही  महाराणा प्रताप के अनुयायी  भी दहन का आनंद उठाते है । इसी से पता चलता है कि कैसे भारत के  कण कण में  कितनी विविधता बसी हुई ।



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