जानें महाभारत कथा की कुछ अद्भुत गाथाएँ

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हिन्दू संस्कृति का सबसे बड़ा महाकाव्य है “ महाभारत कथा , ” जिसमें एक लाख श्लोक और बहुत-से पात्रों की समावृष्टि है | ज़ाहिर-सी बात है अपने इस पौराणिक ग्रंथ की कई कहानियां हम अकसर सुनते आए हैं | अधिकांशतः लोग यही सोचने लगते हैं कि अपने ग्रंथों और शास्त्रों से वे परिचित हैं परन्तु तभी कोई ऐसी घटना सामने आ जाती है, जो इस भ्रम को तोड़ देती है|

महाभारत कथा के कुछ महान महारथी

वास्तव में हमारे समाज में ऐसे बहुत से महापुरुष हैं जो इस घमंड में खोए हुए हैं कि रामायण या महाभारत जैसे ग्रंथों की कथाएँ उन्हें पता है | लेकिन सच तो यह है कि बहुत-सी घटनाएँ ऐसी हैं जो आज भी हमारे सामने नहीं आईं हैं | अपने इस आलेख में हम कुछ ऐसे तथ्यों के बारे में बताएंगे जिनसे शायद आप अवगत ना हों | आइये जानते हैं महाभारत की इन अचंभित करने वाली अद्भुत कहानियों के बारे में –

  • युद्ध-समाप्ति –

    कुरुक्षेत्र का भयानक युद्ध शांत होता है और धर्म को अधर्म पर विजय प्राप्त होती है | पांडवों की विजय की घोषणा होते ही युधिष्ठर व सभी पांडव, पत्नी द्रौपदी के साथ राजपाट सँभालने के लिए हस्तिनापुर प्रस्थान करते हैं |

  • साक्ष्य –

    यह बात सच है कि इतिहास में महाभारत का युद्ध सबसे भयंकर युद्ध था | अर्जुन पुत्र अभिमन्यु और कई महारथी योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए, इसके साथ ही भारी सँख्या में जनसंहार हुआ था | कुरुक्षेत्र की लाल रंग की मिट्टी उस युद्ध का साक्षात प्रमाण है |

  • युयुत्सु –

    धृतराष्ट्र के सबसे छोटे बेटे का नाम था-युयुत्सु | कौरवों में एकमात्र वही था, जिसने अपनी बुद्धि के कारण पांडव-सेना की तरफ से युद्ध किया था | इस बात की जानकारी बहुत ही कम लोगों को है कि (महाभारत कथा) महाभारत युद्ध में 99 कौरव भाइयों का अंत हो गया था और केवल धृतराष्ट्र का यही पुत्र जीवित बचा था |

  • धृतराष्ट्र का शोक –

    अपने पुत्रों की मृत्यु से दुखित हो धृतराष्ट्र शोक में डूब गए थे परन्तु युधिष्ठर का राज-तिलक करने के अलावा उनके पास और कोई विकल्प शेष भी नहीं था | लेकिन पांडवों के लिए गहरी नफरत जो उनके भीतर पनप रही थी, उसका अंत अभी नहीं हुआ था | भीम ने उनके प्रिय पुत्र दुर्योधन को मारा था इसीलिए उनके मन में विशेष तौर पर भीम के लिए नफरत थी, वे भीम को दण्डित करना चाहते थे |

  • श्री कृष्ण की महिमा –

    युधिष्ठर के हाथ में सत्ता की बागडोर देकर क्रोध से भरे हुए धृतराष्ट्र पांडवों को गले लगाने आगे बढ़ते हैं | उनके मन में भीम के प्रति कैसी भावनाएं हैं, इस बात से भगवान कृष्ण वाकिफ थे और उनके नापाक इरादों को भांपते हुए एक धातु का पुतला उनके सामने रख देते हैं | गले लगते ही धृतराष्ट्र के क्रोध से पुतले के कई टुकड़े हो गए और वह चकनाचूर हो जाता है | इस घटना से सबको पता चला कि धृतराष्ट्र के मन में कितना आक्रोश पल रहा था |

  • धृतराष्ट्र (dhritarashtra)का पछतावा –

    पुतले के टूटते ही धृतराष्ट्र को अपनी ग़लती का एहसास हो जाता है और उन्हें अपने किए का पछतावा होता है | दुखित हो धरती पर बैठकर वे विलाप शुरू कर देते हैं और पांडवों से क्षमा प्रार्थना करते हैं | इसके उपरान्त सभी उन्हें सच्चाई से अवगत करवाते हैं |

  • गांधारी (gandhari), कुंती और धृतराष्ट्र की मृत्यु –

    पांडवों के महाप्रस्थान से लेकर युद्ध में कौरवों के विनाश तक की कथाएँ  (महाभारत कथा) तो हमने सुनी हैं | हमें यह भी पता है कि तीरों की शैय्या पर पितामाह भीष्म का दुखद अंत हुआ था | परन्तु धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती के मृत्यु से सम्बंधित तथ्य बहुत कम लोगों को ज्ञात है | असल में युधिष्ठर के द्वारा शासन सँभालते ही हस्तिनापुर का माहौल शांतिमय हो गया था | 15 साल बाद धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती ने भी राजसी जीवन त्यागकर वानप्रस्थ अपना लिया और जंगल में रहकर अपने पाप-कर्मों से मुक्ति के लिए कड़ी तपस्या आरम्भ कर दी |

  • संजय का निश्चय –

    धृतराष्ट्र का साथ निभाने वाले संजय भी इन तीनों के साथ जंगल में गए थे | गंगा-किनारे एक छोटी-सी कुटिया में चारों ने आश्रय लिया और करीब तीन वर्षों तक मोक्ष की इच्छा में माँ गंगा की उपासना करते रहे |

  • मोक्ष-प्राप्ति –

    एक दिन प्रातः काल ही जब धृतराष्ट्र स्नान करने नदी की ओर गए हुए थे, उस घने वन में आग लग गयी | कुटिया छोड़कर गांधारी, कुंती और संजय, धृतराष्ट्र को देखने जाते हैं कि वे किस हाल में हैं | धृतराष्ट्र के पास पहुंचकर वे देखते हैं कि उन्हें कुछ नहीं हुआ है |

  • आग से झुलसते हुए वन को देखकर संजय सभी से वन से बाहर निकलने का निवेदन करते हैं | किंतु धृतराष्ट्र यह कहकर इंकार कर देते हैं कि अब मोक्ष-प्राप्ति का समय निकट आ गया है | धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती आग में जलकर वहीँ अपने प्राण त्याग देते हैं और संजय हिमालय पर जाकर सन्यासी का जीवन व्यतीत करते हैं |

एक साल उपरान्त युधिष्ठर को अपने परिवारजनों की मृत्यु की दुखद सूचना नारद मुनि द्वारा प्राप्त होती है |

  • धार्मिक संस्कार – सूचना प्राप्त होते ही युधिष्ठर और बाकी पांडव, माता कुंती एवं धृतराष्ट्र-गांधारी की आत्मा की शांति के लिए अंतिम-संस्कार की तैयारी करते हैं | और जंगल में मृत्यु-स्थल पर पहुंचकर तीनों वृद्ध जनों का धार्मिक संस्कार संपन्न करते हैं|

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