नवरात्री का छठा दिन माँ कात्यायनी की पूजा अर्चना होती है

नवरात्री का छठा दिन माँ कात्यायनी की पूजा अर्चना होती है

माँ कात्यायनी – कात्यायन ऋषि के यहाँ जन्म लेने के कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ा | सिंह पर सवार इन देवी की भी चार भुजाएं हैं और शिक्षा व विवाह दोनों ही क्षेत्रों में भक्तों की सहायता करती हैं | रोग, शोक और भय नाशिनी देवी ने अपने इसी रूप में महिसासुर का वध किया था, अतः महिषासुर मर्दिनी नाम से जानी गईं | इनकी पूजा के लिए शहद का प्रयोग लाभकारी सिद्ध होता है |

षष्ठी तिथि को सर्वप्रथम कलश व कात्यायनी माता का पूजन करें, इसके लिए हाथ में पुष्प लेकर देवी को प्रणाम कर, उनका स्मरण करें और फिर पुष्प समर्पित कर दें | इसके उपरांत शंकर भगवान, परम पिता और हरि भगवान की लक्ष्मी सहित पूजा करें तभी आपकी आराधना संपन्न होगी | शंखनाद एवं भंडारे देवी को प्रिय हैं, इसीलिए संभव हो तो ये भी करें |

शीघ्र विवाह हेतु या विवाह में आ रही परेशानियों से मुक्ति हेतु माँ कात्यायनी का व्रत रखना सबसे उत्तम उपाय है | इस व्रत का वर्णन भगवद महापुराण के 22वें अध्याय के 10वें स्कंध में मिलता है | इस व्रत के पीछे एक कथा है | एक बार ब्रज के ग्वालों की पुत्रियों ने माघ (मार्गशीर्ष) के पूरे महीने देवी का व्रत किया | इस पूरे माह सारी गोपियाँ सिर्फ बिना मसाले की खिचड़ी खाकर रहीं, और सूर्योदय से पूर्व ही स्नान करके माँ कात्यायनी की स्तुति करती रहीं एवं वरदान में श्री कृष्ण को पति रूप में माँगा | व्रत से माँ प्रसन्न हुईं और फलस्वरूप उन गोपियों को कृष्ण भगवान पति रूप में प्राप्त हुए | कात्यायनी माता की जय ! इनकी उपासना के ये दो मंत्र हैं –

  1. चन्द्र हासोज्ज वलकरा शार्दूलवर वाहना |

   कात्यायनी शुभंदद्या देवी दानव घातिनी ||

  1. या देवी सर्वभूतेषु, सृष्टिरूपेण संस्थिता |

नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः ||  

नवरात्री का सातवाँ दिन माँ कालरात्रि की पूजा अर्चना होती है

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