जब महादेव ने पांडवों को दिया था श्राप तो जानें कैसे मिला उन्हें मुक्ति का मार्ग

जानें पांडवों के अगले जन्म का रहस्य

 हिंदू संस्कृति के महाकाव्य “महाभारत” के प्रसिद्ध पांडव पत्रों से हम सभी भली-भांति परिचित हैं I महाराजा पांडु के महारानी कुंती और माद्री से पांच पुत्र थे, जिन्हें पांडव कहा जाता था I वहीँ धृतराष्ट्र और माता गांधारी के 100 पुत्र कौरव नाम से जाने जाते थे I सत्ता की लालसा में इन दोनों के बीच हुआ कुरुक्षेत्र का युद्ध ही महाभारत युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है I

वैसे हम में से अधिकतर लोगों को महाभारत युद्ध की कथा पता है परन्तु आज हम उस युद्ध से सम्बंधित आपको एक ऐसे तथ्य से अवगत कराएंगे जिसकी शायद आपको जानकारी नहीं होगी I युद्ध अपने अंतिम चरण पर था और समाप्ति की ओर बढ़ रहा था I दुर्योधन जैसे-जैसे अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था, वैसे-वैसे उसे हार का डर सताता जा रहा था, इसलिए युद्ध के आखरी दिन अश्वत्थामा पर विश्वास कर उसे कौरव सेना का सेनापति नियुक्त किया गया I दुर्योधन धर्म और नीति मानने वालों में से नहीं था, उसे तो बस किसी भी हालत में युद्ध में विजयी होने की इच्छा थी I उसकी ऐसी सोच होने के कारण ही अश्वत्थामा को नीति या अनीतिपूर्वक किसी भी तरह, पांडवों के शीश काटकर दुर्योधन के समक्ष प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए I

अपने मित्र दुर्योधन को अश्वत्थामा ने कार्यपूर्ति का वचन दिया और बचे हुए सेनानायकों एवं सैनिकों के साथ पांडवों की मृत्यु का षड्यंत्र रचने लगा I भगवान श्रीकृष्ण को पहले से ही आभास था कि युद्ध के आखरी दिन काल अवश्य ही कुछ योजना बनाएगा I इसलिए पांडवों की रक्षा हेतु यशोदानंदन कोई असरकारक युक्ति सोचने लगे और अंततः वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि देवों के देव महादेव की आराधना करना फलदायी रहेगा I शंकर भगवान की विशेष स्तुति करते हुए श्रीकृष्ण बोले की हे! प्रभु आप ही इस सृष्टि के सृजनकर्ता और आप ही विनाश्कर्ता हो, आप ही इस चराचर जगत के पालनहार हो I

प्रसन्न होने पर आप ही अपने भक्तों को पापों से मुक्ति दिलाने वाले और क्रोधित होने पर स्वयं ही काल रूप धारण करने वाले हो I हे! महादेव मैं श्रद्धापूर्वक आपके चरणों में शीश झुकाता हूँ, कृपया पांडवो की सभी कष्टों से रक्षा की मेरी यह विनती स्वीकार करें I

स्वयं श्रीकृष्ण के पावन मुख से अपनी स्तुति सुन भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और नंदी पर सवार हो उनके समक्ष प्रकट हुए I भगवान शिव बोले कि हे! माधव आपके इन वचनों को सुनकर मैं खुश हुआ और पांडव आपकी शरण में हैं इसलिए उनकी रक्षा का मैं आपको वचन देता हूँ I सभी पांडव पास ही में स्थित नदी में स्नान करने चले गए और देवादिदेव हाथ में त्रिशूल लिए पांडव-शिविर के बाहर पहरा देने लगे I

मौका पाते ही मध्यरात्रि में अश्वत्थामा अपने साथ कृपाचार्य और कृतवर्मा जैसे योद्धाओं को लेकर अपने षड्यंत्र को अंजाम देने पहुंचा I परन्तु शिविर के बाहर स्वयं भगवान शिव को रक्षा करते देख वे ठिठक गए I इसके बाद उन्हें प्रसन्न करने के लिए कौरव दल के तीनों योद्धाओं ने महादेव की स्तुति आरम्भ कर दी I भोलेनाथ तो अपने हर भक्त से अतिशीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं, इसलिए अश्वत्थामा को भी उन्होंने मनवांछित वरदान देने का वचन दिया I अश्वत्थामा ने भी अवसर का लाभ उठाते हुए दो वरदान मांग लिए, पहले वरदान में उसने बड़े से बड़े महारथी को भी दो भागों में विभाजित करने वाले शास्त्र की मांग की और दूसरे वरदान में उसने यह कामना ज़ाहिर की कि पांडवों के शिविर को मैं बस एक रात के लिए निर्भय होकर देख सकूँ, उसमें प्रवेश कर सकूँ I

मांगे हुए वरदान अनुरूप भोलेनाथ ने अश्वत्थामा को एक ऐसी तलवार प्रदान की जो साधारण प्रहार से भी सामने वाले के टुकड़े कर दे और साथ ही उसे पांडव-शिविर में जाने की आज्ञा भी मिल गई I बस फिर क्या था, तीनों योद्धा शिविर में घुस गए परन्तु अंधेरे के कारण धोखे में अश्वत्थामा ने पांडव समझकर पांडव-पुत्रों का शीश काट, उन्हें लेकर वापस लौट गए I

स्नान के बाद जैसे ही पांडव लौट कर आए तो शिविर में एकमात्र बचे पार्षद सूत्र से उन्हें इस जनसंहार की सूचना प्राप्त हुई I यह दुखित खबर मिलते ही पांडव सोचने लगे कि स्वयं भगवान शंकर के होते हुए हमारे पुत्रों की हत्या करने का दुस्साहस कौन कर सकता है I शोकग्रस्त होने के कारण उनकी बुद्धि ने काम करना बंद कर दया और वे मान बैठे कि हो ना हो इस जनसंहार के पीछे महादेव का ही हाथ है I अपनी मर्यादा को भूल पांडव भगवान शिव से युद्ध करने चल पड़े I

क्योंकि पांडव श्रीकृष्ण की शरण में थे एवं भगवान शम्भू उनकी रक्षा का वचन दे चुके थे, इसलिए उन्होंने पांडवों पर कोई प्रहार नहीं किया और शांत भाव से बस उनकी मूर्खता का अवलोकन करते रहे I अंत में भगवान शिव यह कहकर अंतर्ध्यान हो गए कि मेरे शरणार्थियों अभी तो मैंने तुम्हे क्षमा किया परन्तु अपने इस घोर अपराध का दंड तुम सबको कलियुग में भुगतना पड़ेगा I

कुछ देर उपरान्त पांडवों को अपनी भूल का एहसास हुआ और वे दौड़ते हुए श्रीकृष्ण भगवान की शरण में गए I तब श्रीकृष्ण बोले तुम लोगों से बहुत बड़ा अपराध हो गया है, अब इससे मुक्ति का समाधान तो स्वयं महादेव ही बता सकते हैं I इतना कहते ही सभी पांडव भाइयों ने कृष्ण भगवान के साथ मिलकर महादेव की विशेष आराधना आरम्भ कर दी I

श्रद्धा से की गई अपनी स्तुति सुन भगवान भोलेनाथ प्रसन्न हुए और प्रत्यक्ष आकर दर्शन दिए I पांडवों के नेतृत्व में माधव बोले कि हे! नीलकंठ, हे! देवों के देव पांडवों की मूर्खता के लिए उन्हें क्षमा करें और दिए गए श्राप से मुक्त करने की कृपा करें I वे अपने अपराध के लिए क्षमाप्रार्थी हैं, अतः जैसा ठीक जान पड़े, वैसा करें I

भगवान शिव ने उत्तर दिया कि हे! कृष्ण, माया के प्रभाव में होने के कारण उस समय मैं पांडवों को श्राप दे बैठा किंतु अब इस श्राप को वापस लेने में असमर्थ हूँ I हाँ, परन्तु इनकी सहायता हेतु मैं मुक्ति का मार्ग अवश्य बता सकता हूँ I अपने-अपने पापों को भोगने के लिए पांडव तथा कौरव दोनों ही अपने अंश से कलियुग में जन्म लेंगे और अंत में मुक्ति पाएँगे I

धर्मपुत्र युधिष्ठर बल्खानी नाम के साथ वत्सराज का पुत्र बनकर जन्म लेगा तथा शिरीषनगर पर राज करेगा, भीम बनारस का रजा होगा और उसका नाम विरान होगा I अर्जुन अपने अंश से ब्रह्मानंद रूप में जन्म लेगा और मेरा परम भक्त होगा I वहीँ नकुल के अंश से रत्नाभानु के पुत्र कान्यकुब्ज का तो सहदेव का जन्म भीम सिंह के पुत्र देव सिंह के रूप में होगा I इस प्रकार महादेव पांडवों के अगले जन्म के बारे में बताकर अंतर्ध्यान हो गए और पांडव भी आत्मग्लानी से मुक्त हुए I

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