ऐसे परिक्रमा करने से मिलता है वास्तविक लाभ


व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का हो अकसर अपने धर्म से सम्बंधित तीर्थ स्थल की यात्रा के लिए अवश्य जाता है | प्रत्येक धर्म और स्थान के अपने अलग-अलग नियम और मानताएं होती हैं | हिन्दू धर्म में भी जब भी हम किसी मंदिर या अन्य पवित्र जगह पर जाते हैं तो प्रायः हमें वहां जलकुंड, तालाब या जल का कोई भी स्त्रोत देखने को मिल ही जाता है | परन्तु कभी आपके मन में विचार आया कि इनका निर्माण क्यों किया जाता है | हम तीर्थों पर चले तो जाते हैं, कोशिश भी करते हैं कि सारे नियम और परम्पराओं का पालन हो सके लेकिन शायद पालन करते-करते ये सोचना भूल जाते हैं कि इन सब के पीछे कारण क्या है ?

अगर नहीं विचार किया है तो कोई बात नही क्योंकि आज हम आपको यह सारी बातें बताने जा रहे हैं | मंदिर की अहम परम्पराओं में से एक यह भी है कि हम एक विशेष दिशा में परिक्रमा करते हैं, जिसके पीछे धार्मिक मान्यता तो है ही साथ ही वैज्ञानिक कारण भी स्पष्ट है | असल में परिक्रमा या जिसे प्रदक्षिणा भी कहा जाता है वह उत्तरी गोलार्ध में उसी दिशा में की जाती है जिस दिशा में घड़ी की सुई घूमती है | वास्तव में केवल इंसान ही नहीं बल्कि उत्तरी गोलार्ध की सभी वस्तुएं इसी स्वाभाविक प्रक्रिया से गुज़रती हैं | ऐसे ही समस्त ऊर्जा तंत्र की कार्य प्रणाली कार्य करती है | हम आपको उदाहरण देकर स्पष्ट करते हैं | आपने कभी ध्यान दिया होगा और नहीं दिया तो अब दीजिएगा कि जब भी हम जब भी किसी पानी की टंकी को खोलते हैं तो जल की धारा पहले सुई वाली दिशा में मुड़ेगी तभी नीचे गिरेगी |

इसी प्रकार अगर हम दक्षिणी गोलार्ध की बात करें तो वहां जाकर टंकी खोलने वाली प्रक्रिया दोहराने से विपरीत परिणाम देखने को मिलेंगे | पानी ही नहीं बल्कि पृथ्वी पर सभी चीज़ें, सभी पदार्थ ऐसे ही काम करते हैं |

इसीलिए तथ्य यही है कि यदि उत्तरी गोलार्ध में रहकर किसी भी शक्ति स्थल की ऊर्जा आप प्राप्त करना चाहते हैं, तो आपको भी उसके चारों और घूम कर प्रदक्षिणा करनी चाहिए | ध्यान रहे यह घड़ी की सुई वाली दिशा में ही हो | जब आप सुई की दिशा में सच्चे मन के साथ परिक्रमा लगा रहे होते हैं, तब आप अकेले नहीं होते बल्कि कुछ विशेष प्राकृतिक शक्तियां भी आपके साथ ही चक्कर लगा रही होती हैं |

किसी भी माननीय एवं शिष्ट स्थान पर एक ऐसा आकर्षण से भरा कम्पन होता है जो हमें अपनी ओर खींचता है | और इस तरह हम परमात्मा के साथ एक जुड़ाव, संधि व मिलन का एहसास कर पाते हैं | वहीँ जब हम ऐसे पवित्र और गौरवपूर्ण स्थलों की सुई की दिशा में प्रदक्षिणा करते तो इस शक्ति और ऊर्जा को ग्रहण करने की संभावनाएं कई गुणा बढ़ जाती हैं | भूगोलीय दृष्टि से देखें तो भूमध्य रेखा से 33 डिग्री अक्षांश पर सबसे तीव्र गति से इनका लाभ उठाया जा सकता है |

इसके अतिरिक्त और भी तरीके हैं जिनके द्वारा आप अधिक फायदा प्राप्त कर सकते हैं | जैसे पहला तरीका यह है कि परिक्रमा के वक़्त आपके बाल गीले हों और यदि इसके साथ आपके वस्त्र भी गीले होंगे तो यह फायदा कई गुणा बढ़ जाता है | कुछ लोगों के अनुसार नग्न अवस्था में घूमना सबसे ज्यादा लाभकारी सिद्ध होता है | परन्तु अगर ऐसा करेंगे तो शरीर तो जल्दी सूख जाएगा और वहीँ गीले कपड़े देर तक आपका साथ देंगे | इसीलिए हमारी सलाह यही है कि ऊर्जा को अच्छी प्रकार से ग्रहण करने के लिए आप हमेशा भीगे हुए वस्त्रों में ही परिक्रमा करें |

ऐसा माना जाता है कि पहले प्रत्येक मंदिर या तीर्थस्थल पर एक जलकुंड या जलाशय होता ही था | उस समय इनको कल्याणी के नाम से जाना जाता था जिनमें डुबकी लगाने के उपरान्त ही मंदिर का भ्रमण किया जाता था | आज भी कई लोग हैं जो इस परंपरा को निभा रहे हैं जबकि कुछ नहीं | बहुत सी जगह हम चाहकर भी यह नहीं कर पाते क्योंकि अज अधिकतर जलाशय या तो प्रदूषित हो गए हैं या सूख गए हैं | अब ज़रुरत हमारे जागने की और इनके लिए कुछ कदम उठाने की है ताकि पूर्वजों के रिवाज़ को बचा सकें जो हमारे ही फायदे के लिए हैं |

अब अगर आप भी किसी मंदिर जैसे स्थान पर जाएं तो परिक्रमा के समय इन नियमों का ध्यान अवश्य रखें |

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