क्या आप जानते है की रावण के पास 72 करोड़ की सेना थी , पूरी कहानी पढ़े


हम सभी  दशहरा के दिन  बचपनें में  खुलकर  रावण को जलाते थे और मजे से लोग उसके जलने की खुशी  में मिठाई   बांटते थे  उसके बाद  राम की पूजा करते थे  । लेकिन क्या कभी ये दिमाग में आया कि यह युद्ध कितना लंबा चला  होगा ।  शास्त्रो के मुताबिक ,जब राम रावण से युद्ध लड़ रहे थे तब रावण सेना की संख्या 72 करोड़ थी फिर भी इतना विशाल युद्ध 8 दिन में ही समाप्त हो गया ।  कैसे ?  समझ से परे था । बता दें कि राम और रावण का युद्ध अश्विन पक्ष की तृतीया तिथि को शुरु हुआ था और यह युद्ध 8 दिन तक चला । इसका अंतिम पड़ाव  दशमी को रावण के अंत के बाद हुआ । उसे आज दशहरे के नाम से पुकारते है ।

इसे पढ़कर आपके दिमाग जरुर आया होगा कि इतना बड़ा युद्ध, जिसके लोग दिवाने है वो बस 8 दिन में समाप्त हो गया । तो बताते है  कि ऐसा कैसे संभंव हुआ  । माना जाता है कि उस समय की रातें इतनी लंबी होती थी कि आपकी सोच से भी परे है क्योंकि सिर्फ देवताओं को ही अंदाजा होता था ।

लंका नरेश की सेना में 72 करोड़ सैनिक थे तब भी, श्री राम की वानर सेना ने राक्षस सेना में तहलका मचा दिया था जिसका परिणाम केवल 8 दिनों  निकल आया और रावण को  पराजय के साथ मृत्यु का सामना करना पड़ा ।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि श्री राम और लक्ष्मण रावण के पुत्र मेघनाद  से दो बार  परास्त हुए थे लेकिन रावण ने अपनी मर्यादा बरकरार रखी । जिसका पता ऐसे लगता है कि युद्ध के दौरान लक्ष्मण के घायल होने के बावजूद रावण ने मौके का फायदा नहीं उठाया और राम की सेना पर हमला नहीं बोला ।

रावण की सेना में महारथियों की कमी नहीं थी , युद्ध के दौरान रावण के परिवार में से पुत्रों और भाइयों ने सेना नायक की अहम भूमिका निभाई थी ।

शास्त्रों के मुताबिक , रावण ने अपने भाईयों से राम और लक्ष्मण का अपहरण करने को कहा था साथ ही उन्होंने राम और लक्ष्मण को छल से मारने तक की कोशिश भी की थी ।

”रावण संहिता” जिसमे रावण ने बताया था उसके धनवान होने का राज, जाने “धन प्राप्ति के अचूक व शक्तिशाली उपाय

बता दें कि  रावण के भाईयों के नाम अभिरावण और महिरावण  थे । रावण ब्रह्मा से वरदान प्राप्त थे इसलिए उन्हें दशग्रीव बुलाया जाता था  लेकिन उनके अमर होने का कारण ये था कि उसकी नाभि में अमृत था  इसलिए वो अमर थे     ।

रावण का एक पुत्र अतिक्या,  जो कि राम और लक्ष्मण पर भारी पड़  सकता था क्योंकि अतिक्या के पास वरदान था कि वो जब तक चाहे वो गायब रह सकता था । माना जाता है कि इस ताकत की वजह से बहुत से युद्ध क्षण भर में समाप्त हो जाया करते थे ।लेकिन जरा सोच कर देखिए , अगर इस अहम वक्त में देवराज इंद्र ने लक्ष्मण की मदद नहीं की होती तो अतिक्या का वध मुमकिन नहीं हो पाता और  रावण पर विजय प्राप्त करना नामुमकिन हो जाता ।

गुरु शुक्राचार्य के नाम को कौन नहीं जानता और उनका शिष्य रावण पुत्र मेघनाद  था जिसको शुक्राचार्य ने सारे देवशास्त्रों का ज्ञान दिया था  । मेघनाद के चर्चे स्वर्गलोक में भी हुआ करते थे  क्योंकि एक बार की बात थी जब मेघनाद ने स्वयं देवराज इंद्र की गद्दी पर कब्जा कर लिया था साथ ही उन्हें बंदी तक बना लिया था अगर ब्रह्मदेव ने इंद्र को छोड़ने का आदेश नहीं दिया होता तो इंद्र के प्राण बचना मुश्किल था । इसलिए ब्रह्मदेव ने मेघनाद को महायोद्धा और इंद्रजीत के नाम की उपाधि दे दी थी।

मेघनाद  कोई आम योद्धा और तपस्वी नहीं था क्योंकि जब भी वो अपनी कुल देवी के सामने सर छुकाता था और तपस्या में लीन हो जाता था  तो उस वक्त के लिए उसका कोई भी बाल भी बांका नहीं कर पाता था यहां तक की खुद त्रिदेव भी  मजबूर थे ।

 शास्त्रों के हवाले से ,मेघनाद अपने पिता रावण से काफी हद तक सहमत नहीं था साथ ही रावण के अधर्म के मार्ग पर  बढ़ते कदमों को रोकने की जहदोजहद जरुर की थी लेकिन रावण ने किसी की नहीं सुनी । इसलिए पुत्र धर्म को ध्यान में रखते हुए  लक्ष्मण के साथ युद्ध में मेघनाद ने प्राणों को त्याग दिया ।

रावण के अंहकार इतना  बढ़ गया था कि युद्ध जीतने के लिए अपने दोनों भाइयों को राम और लक्ष्मण का अपहरण करवा दिया था  अद्भुत एवं विचित्र मायावी शक्तियों के स्वामी अभिरावण एवं महिरावण अपने कुल देवता को खुश करने की चाहत राम और लक्ष्मण की बलि चढ़ाने वाले थे लेकिन हनुमान जी ने ऐन मौके पर पहुंच कर सेवक होने का कर्तव्य निभाया  और दोनों के जीवन की सुरक्षा की । और दोनों राक्षसों को उनकी के जाल में फंसा कर बलि चढ़ा दी ।

रावण के पराक्रम के चर्च स्वर्गलोक से लेकर नरकलोक थे । रावण की ताकत का लौहा  सब ठोकते थे क्योंकि एक उन्होंने महादेव के ही निवास स्थान कैलाश पर्वत को अपनी भुजाओं के बल पर उठा लिया था  लेकिन यहीं लम्हा था जब रावण अपने अहम में चूर होकर  देवताओं को अपना दुश्मन बना बैठा  वरना शायद देवताओं के स्वामी का दर्जा मिल जाता ।

ब्रह्मा के दस मानसपुत्रों का श्राप न लगा होता तो रावण जैसा पराक्रमी भी पृथ्वी पर पैदा नहीं होता । क्योंकि जब युद्ध चल रहा था तब रावण की सेना राम की सेना पर पूरी तरह हावी थी जिसे लेकर भगवान राम भी परेशान थे लेकिन अंतिम समय में विभीषण ने रावण की मृत्यु का रहस्य खोल दिया और रावण को हार का सामना करना पड़ा ।

No Comments Yet

Leave a Reply

Your email address will not be published.

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>