जानिये क्या कहते थे शकुनि मामा के पासे

बातों-बातों में जब भी बुरे मामाओं का ज़िक्र आता है तो कंस और शकुनि ही सबसे पहले याद आते हैं | एक जिसने अपनी मृत्यु के डर से बहन-बहनोई को बंदी बना, सात भांजों को मार आठवें को मारने का प्रयास किया तो दूसरे ने अपनी बहन के पूरे वंश का ही नाश कर दिया | लेकिन आज इस लेख में हम बात करेंगे द्वापर युग के शकुनि मामा की एवं उनसे और उनके पासे से जुड़े कुछ रहस्य भी खोलेंगे |

शकुनि को हम महाभारत के खलनायक के रूप में जानते हैं जिसकी उपस्थिति ने पूरे कुरु वंश का विनाश कर दिया | शकुनि के बारे में बहुत सी कहानियां हैं, जो प्रचलित नहीं हो पाईं, इसी कारण से इसे सबसे रहस्मय पात्र भी माना जाता है | शकुनि अपनी इकलौती बहन गांधारी से अगाध स्नेह रखता था इसीलिए आज के युग में अकसर लोगों के मन में यह शंका रहती थी कि शकुनि ने इतनी घिनौनी चालें क्यों चली | हमें उम्मीद है कि आपके मन में भी यह जिज्ञासा होगी कि शकुनी ने अपनी बहन के परिवार को तबाह क्यों कर दिया, तो आइये आपके इस प्रश्न का उत्तर आज आपको देते हैं इन दो कथाओं के माध्यम से |

  • प्रथम कहानी –

हम सब जानते हैं कि शकुनि का प्रिय खेल चौसर था और आश्चर्य की बाय यह कि वह इस खेल को अपनी मर्ज़ी और कुशलता के साथ खेल सकता था | अर्थात पासों को अपने मन मुताबिक चला सकता था | इसी खेल से शकुनि ने कुरुवंश की कुलवधू द्रौपदी का चीरहरण करवाया, पांडवों को वनवास दिलवाया और उनका अपमान करवाया, कदम-कदम पर अपनी मर्ज़ी चलवाई और कुल की छवि को पलट कर रख दिया | हम यह तो जानते हैं कि पासे भी शकुनि की बात सुनते थे परन्तु अपने स्वामी के प्रति इस निष्ठा का कारण एक रहस्य है, जिसे आज हम खोलेंगे | हम आगे जानेंगे कि शकुनि के मन में कुरुवंश के विनाश की कामना का जन्म कैसे हुआ ? यह कामना और पासों की निष्ठा एक-दूसरे से गहन रूप में जुड़ी हुई है जिसका प्रारंभ कहीं ना कहीं गांधारी के जन्म के समय ही हो गया था |

बात उस समय की है जब गांधारी ने जन्म लिया था और उनकी कुंडली का निर्माण करवाया जा रहा था | कुंडली बनते ही उसमें एक समस्या प्रकट हुई, बाकी सब तो ठीक था लेकिन उसमे गांधारी के विधवा होने का योग था | गांधार नरेश को ज्योतिष्यों ने बताया कि गांधारी की दो शादियाँ होगी क्योंकि उनके पहले पति की मृत्यु निश्चित है और दूसरा पति ही जीवित रहेगा | यह सुनकर महाराज को चिंता हुई और उन्होंने गांधारी का विवाह एक बकरे से करवा दिया और बकरे की बलि दे दी गई | ऐसा करते ही गांधारी की कुंडली से विधवा योग का दोष समाप्त हो गया एवं उसका परिवार चिंतामुक्त हो गया | जब गांधार की राजकुमारी विवाह के योग्य हो गई तो उनके लिए हस्तिनापुर से धृतराष्ट्र का प्रस्ताव पहुंचा |

धृतराष्ट्र नेत्रहीन हैं, यह जानते हुए भी ना जाने क्यों गांधारी के माता-पिता ने इस प्रस्ताव पर अपनी स्वीकृति जता दी | माँ-पिताजी के खातिर गांधारी भी इस विवाह से इंकार ना कर पाईं | लेकिन इस विवाह से जो सबसे ज्यादा नाखुश था वह था शकुनि, उसे बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था कि उसकी प्यारी और इकलौती बहन का विवाह किसी दृष्टिहीन के साथ हो | परन्तु शकुनि की बात नहीं सुनी गई और गांधारी हस्तिनापुर की वधु और धृतराष्ट्र की पत्नी बन ही गई |

मुसीबतें यहाँ समाप्त नहीं हुईं थीं बल्कि एक नया अध्याय सामने आया जब धृतराष्ट्र को ज्ञात हुआ कि गांधारी विधवा है | हालांकि, जैसा ऊपर हम बता चुके हैं कि गांधारी का पहला विवाह सिर्फ एक बकरे से किया गया था उसके पति की मृत्यु का योग मिटाने के लिए | परन्तु क्रोध और आवेश में धृतराष्ट्र कुछ समझना ही नहीं चाहता था और उसने गांधार पर आक्रमण तो किया ही साथ ही वहां के महाराज सहित सभी पुरुष सदस्यों को कारागार में बंदी बना के डाल दिया |

पर धृतराष्ट्र का बदला अभी भी पूरा नहीं हुआ था क्योंकि उसके बंदी अभी जीवित थे और धृतराष्ट्र जनता था कि युद्ध में बनाए गए बंदियों को मारना अधर्म था, नैतिकता के खिलाफ था | इसीलिए धृतराष्ट्र ने उन्हें भूख-प्यास से तड़पाकर मारने की युक्ति सोची | अब सैनिकों को निर्देश दिया गया कि पूरे दिन में गांधार के बंधक परिवार को केवल एक मुट्ठी चावल ही दिए जाएँगे | कारागार में भी सभी लोग धृतराष्ट्र से परेशान हो चुके थे, अतः सबने धृतराष्ट्र और उसके परिवार से प्रतिशोध लेने का निर्णय लिया |

सभी की सहमती से तय हुआ कि चावलों को केवल कनिष्ठ पुत्र शकुनि को खिलाया जाएगा ताकि वह कुरु वंश को बर्बाद कर सके | समय बीतता गया और शकुनि की आँखों के सामने उसका पूरा परिवार धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त होता गया | अब शकुनि के मन में क्रोध की ज्वाला भड़क रही थी, वह कुछ भी करके बस कुरु-वंश की तबाही चाहता था |

शकुनि के पिता ने मृत्यु के समय अपने पुत्र से कहा था, “प्रिय पुत्र ! मेरे अंत के उपरांत मेरी अस्थियों से एक पासे का निर्माण करना | यह पासा तुम्हारी ही बात मानेगा जिससे तुम्हारा लक्ष्य अवश्य पूरा होगा |” इसके बाद से ऐसी मान्यता बन गई कि शकुनि के पासे उसके लिए इसीलिए इतने समर्पित थे क्योंकि उन पासों में उनके पिता की रूह का वास हो गया था |

  • द्वितीय कहानी –

ऊपर वाली कहानी के अतिरिक्त एक और कहानी प्रचलित है | हालांकि, ऊपर वाली कहानी थोड़ी अधिक तार्किक लगती है और प्रचलित भी अधिक है | इस दूसरी कहानी के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि शकुनि के पासों के अन्दर 6 पैर वाले एक जीवित भँवरे का वास था | शकुनि इस बात को जानता था कि यह भंवरा मेरे चरणों में आकर गिरेगा इसीलिए वह भी 6 अंक ही कहता था बार-बार और खेल जीत जाता था |

महाभारत का एक पात्र मटकुनि भी था जो शकुनि का सौतेला भाई था, वह शकुनि की चालों से भली-भांति परिचित था | इसीलिए उसने धर्म के खातिर युधिष्ठिर की सहायता करने का निर्णय लिया एवं महायुद्ध होने से पूर्व एक ऐसा पासा लिया जिसमें छिपकली का वास हो | जब चौसर का खेल दोबारा प्रारंभ हुआ तो इस बार कुछ अलग ही नज़ारा देखने को मिला | छिपकली के डर से भंवरा घबरा जाता था और अपने सारे पैर सर के ऊपर रख लेता था और जब पासा गिरता था तो मात्र 1 ही अंक रह जाता था | शकुनि भी आश्चर्यचकित था कि मेरे 6 अंक पर भी पासा 1 अंक क्यों ला रहा है परन्तु अंत में वह हार ही गया |

यह कहानियां दन्त-कथाएँ कहलाती हैं जिन्हें मूल ग्रन्थ से कोई प्रमाणिकता प्राप्त नहीं है | विश्वास करना अब आप पर निर्भर करता है क्योंकि यह दन्त-कथाएँ कई बार गुप्त रहस्य भी होती हैं |  



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