जानिये, कैसा होता है मृत्यु के बाद का सफ़र

दिन हुआ है तो शाम भी होगी, जिसका आरम्भ हुआ है उसका अंत भी होगा | ऐसे ही जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित है | हम जानते हैं कि सच कड़वा होता है और मृत्यु एक ऐसा कड़वा सच है जिसे हम जानते हुए भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं रहते | मौत से डरते हैं, उससे दूर भागते हैं | मृत्यु के बाद जीवात्मा का क्या हश्र होता है और वह क्या-क्या झेलती है, यह एक बड़ा रहस्य है |

हमारे धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में मृत्यु और उसकी बाद की यात्रा का ख़ास वर्णन मिलता है, जो आज हम आपके लिए लेकर आएं हैं | गरुड़ पुराण से लिए गए ध्यान देने योग्य इन तथ्यों को आप भी अवश्य पढ़ें |

कहते हैं मनुष्य की मृत्यु के बाद का जीवन उसके कर्म निर्धारित करते हैं, जिनका हिसाब चित्रगुप्त रखते हैं | अच्छे कर्म आपको स्वर्ग की ओर ले जाते हैं तो बुरे कर्म आपके लिए नर्क के द्वार खोलते हैं | इतना ही नहीं यदि व्यक्ति सत्कर्म करेगा तो उसको लेने देवदूत स्वयं आएँगे जबकि दुष्टात्माओं को लेने भयानक यमदूत आते हैं | अगर मनुष्य को यमदूत लेने आते हैं तो याद रखें कि आत्मा को पहले यमलोक ले जाया जाता है, जहाँ उसके लिए उचित दंड तय किया जाता है |

अब आपके मन में यह प्रश्न होगा कि यमलोक तक जाने का सफर कैसा होता होगा | इस प्रश्न का उत्तर हम आपको आगे देंगे और साथ ही यह भी बताएँगे iकि मनुष्य के प्राण निकलते कैसे हैं और किस तरह उसे पिंडदान की प्राप्ति होती है | गरुड़ पुराण में हिन्दू संस्कृति के सभी संस्कारों और प्रक्रियाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है, जिसके द्वारा आज हम आपके प्रश्नों का उत्तर भी देंगे | जिन भाई-बहनों को नहीं पता है कि गरुड़ पुराण क्या है, उन्हें हम बता दें कि यह हमारा एक पौराणिक ग्रन्थ है | ऐसी मान्यता है कि इसमें लक्ष्मीपति नारायण के वाहन गरुड़ के संवाद संकलित हैं जिनके आधार पर मनुष्य मृत्यु के बाद का सफ़र ज्ञात करता है | जब भी किसी हिन्दू के घर में किसी की मृत्यु होती है तो उसके समस्त परिवारजन गरुड़ पुराण का श्रवण करते हैं |

इस ग्रन्थ के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जब मनुष्य की मृत्यु का समय निकट आता है तो उसकी सभी इन्द्रियां धीरे-धीरे नष्ट होने लगती हैं | इस कारण वह हिल-डुल नहीं पाता, बात करना चाहता है परन्तु बोलने में असमर्थ रहता है और अंततः जड़ अवस्था में पहुँच जाता है | उसे दिव्यदृष्टि भी प्राप्त होती है जिससे वह यमदूतों को अपने करीब महसूस कर पाता है और कहीं ना कहीं यह आभास कर लेता है कि मैं मरने वाला हूँ | व्यक्ति की मोह-माया कहीं पीछे छूटने लगती है और वह पूरी दुनिया को समान दृष्टि से देखने लगता है | इसके बाद मुंह से लार टपकना और झाग निकलने जैसे लक्षण दिखाई देते है और फिर मनुष्य अपने प्राण त्याग देता है |

कहते हैं कि पुण्यात्माओं के प्राण ऊपर के हिस्से से अर्थात सिर, आँख, कान, नाक या मुंह से निकलते हैं जबकि पापियों के प्राण निचले मार्ग से निकलते हैं | यहाँ तक कि जिन लोगों के कर्म अच्छे होते हैं उनकी मृत्यु शांति से हो जाती है और पाप कर्म करने वालों की मृत्यु बहुत अधिक कष्टदायक होती है | जैसा हम ऊपर बता चुके हैं कि पापियों के प्राण हरने दो यमदूत आते हैं | अपने अंत समय में मनुष्य को ये भयानक यमदूत दिखने भी लगते हैं, जो नग्न अवस्था में होते हैं तथा हाथों में पाशदंड धारण करते हैं |

गरुड़ पुराण में यमदूतों का बड़ा भयानक वर्णन है | उनके नेत्रों में क्रोध की ज्वाला धधक रही होती है एवं दाँतों को गुस्से में कटकटा रहे होते हैं | ये टेढ़े-मेढे मुंह वाले और बहुत खतरनाक होते हैं, घने-काले बाल और पैने नाखून जो शस्त्रों के भांति घायल करने का सामर्थ्य रखते हों, इनकी निशानी है | ज़ाहिर सी बात है कोई भी इस भयानक रूप को देख कर डर जाएगा और इसी कारण मनुष्य भी भय से कांपता हुआ मलमूत्र का त्याग कर देता है | और मलमूत्र त्यागते-त्यागते ही उसके प्राण भी निकलने लगते हैं | अंगूठे के बराबर छोटा सा जीव हा हा शब्दोच्चारण करता हुआ नीचे के मार्ग से निकलने लगता है एवं यमदूत उसे पकड़ लेते हैं|

फिर यमदूतों द्वारा उस पापी शरीर को किसी बंदी की तरह यमलोक ले जाया जाता है | भोगने वाली जीवात्मा के गले में पाश बंधा होता है और नर्क की पीडाओं का बार-बार वर्णन किया जाता है जिससे वह डर जाती है और रुक जाती है पर यमदूत उसे धक्का देते हुए आगे बढ़ाने लगते हैं | जैसे-जैसे आत्मा आगे बढती है, उसे कुत्ते से कटवाया जाता है, वह हिंसक जानवरों का दर्द सहता है , रोता-चिल्लाता है, थक कर चूर हो जाता है पर उस पर दाया नहीं की जाती |

इतने कष्टों को झेलते हुए जीवात्मा अपने पाप-कर्मों को याद करते हुए जैसे-तैसे चलती है और दुखी होती है, भूख-प्यास से तड़पती है | जलती हुई गर्म रेत और उष्म हवाएं प्राणी को और थकाती हैं एवं उसकी राह को कठिन बनाती हैं | पापी जीव बेहोश हो कर पग-पग पर गिरता है पर यमदूत चाबुक मारते हुए, धक्का देते हुए उसे अंधेरे से परिपूर्ण मार्ग से यमपुरी ले जाते हैं |

यमलोक पहुँचने के बाद यमदूतों द्वारा जीव को नर्क की भयानक यातनाएं दी जाती हैं जिनसे वह डरता है और फिर यमराज की अनुमति से अपने घर वापस पहुँचता है | घर में आकर परिवारजनों को देख कर आत्मा दुखी होती है एवं वापस शरीर में प्रवेश की कोशिश करती है | चूँकि वह पाश से बंधी होती है, इसीलिए प्रवेश नहीं कर पाती और रोने-बिलखने लगती है | पुत्र या वंशज जो पिंडदान करते हैं या जो श्रद्धांजलि देते हैं, वह भी उन आत्माओं को नहीं प्राप्त होती जिन्होंने पाप कर्म किए होते हैं | अंततः प्राणी के पास भूख-प्यास से तड़पते हुए यमपुरी जाने के अलावा कोई चारा नहीं होता है |

गरुड़ पुराण यह भी कहता है कि मृत्यु के उपरान्त 10 दिन तक प्रतिदिन पिंडदान होता है जिसके हमेशा चार हिस्से करने चाहिए | इसका कारण होता है कि पहले दो भाग पंचमहाभूत को, तीसरा यमदूत को और चौथा भाग जाकर प्रेत को प्राप्त होता है | ऐसा नहीं है कि पहले दिन से ही आत्मा भोजन खाने लगती है बल्कि शव को मुखाग्नि देने के उपरांत इस पिंड से प्रथम दिन उसका सिर बनता है, दूसरे दिन गर्दन और कंधे का निर्माण होता है | तीसरे दिन के पिंड से ह्रदय, चौथे दिन पीठ, पांचवे दिन नाभि और छठे दिन कमर बनती है | सातवें दिन जाकर कमर के नीचे का भाग, आठवें दिन पैर और नवें दिन शरीर का पूर्ण निर्माम होता है जो यमलोक जाकर अपने कर्मों का फल भोगता है | दसवें दिन पर पिंड शरीर को कुछ शक्ति मिलती है और उसे भूख-प्यास का एहसास होता है, फिर कहीं ग्यारहवें और बारहवें दिन प्रेत भोजन करता है |

जैसे मदारी अपने बन्दर को पकड़ता है उसी प्रकार यमदूत तेरहवें दिन प्रेत को पकड़कर यमलोक ले जाते हैं | यह पुराण बताता है कि यमपुरी कुल 99 योजन अर्थात 13-16 कि.मी में फैला है और वहां तक पहुँचने का रास्ता 86,000 योजन का है | प्राणी को प्रतिदिन करीब 200 योजन चलवाया जाता है तब जाकर वह 47 दिनों में यह यात्रा पूर्ण कर यमलोक पहुँचता है | हालांकि, यमलोक तक तक पहुँचने का एक थोड़ा सरल तरीका वैतरणी नदी का भी है जिसे व्यक्ति तभी पार कर सकते हैं जब उसने अपने पूरे जीवन काल में कभी गौदान करी हो | यदि व्यक्ति ने गाय का दान नहीं किया है तो रक्त और पस से भरी उस सरिता में यमदूत उसको डुबो-डुबो कर तड़पाते हैं |

यमराज के घर तक पहुँचने के के लिए मनुष्य कुल 16 पुरियों को पार करता है | इन सोलह पुरियों के नाम हैं – सौम्य, सौरिपुर, नगेन्द्रभवन, गन्धर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, ब्रह्मापाद, दुःखद, नानाकंद्रपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीतढय, और बहुभीति | इन सभी लोकों को पार कर यमलोक पहुंचा जाता है जहाँ पापी प्राणी ऊपर बताई हुई दीं अवस्था से गुज़रते हुए पहुँचता है |

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