स्त्री और पुरुष में से कौन उठाता है संभोग का अधिक आनंद

भारत के साथ-साथ बहुत से देशों के लोगों में यह शंका है कि स्त्री और पुरुष में से संभोग का कौन ज्यादा रस ले पाता है, कौन है जो इसका भरपूर आनंद उठा पाता है? हालांकि, इससे सम्बंधित सभी की अलग-अलग धारणाएं हैं | पर वास्तविकता क्या है और इस सवाल का सच क्या है, यह तो आप भी जानने के इच्छुक होंगे | कुछ पौराणिक कथाओं में इस सवाल का उत्तर भी मिलता है, जिनसे आज हम आपको अवगत कराएंगे | जिन दो ग्रंथों की कथा हम आपको आज बताने जा रहे हैं, उनमें से एक है हिन्दू धर्म का प्रसिद्ध ग्रंथ “महाभारत,” और दूसरी मान्यता यूनान (ग्रीक) के धार्मिक ग्रन्थ की है |

  • महाभारत की कथा –

एक समय की बात है जब धर्मराज युधिष्ठर अपनी समस्या लेकर पितामाह भीष्म के पास गए | कुछ देर मौन अवस्था में बैठने के उपरान्त कुंती पुत्र बोले कि हे पितामाह ! मैं आपसे अपनी एक शंका का समाधान लेने आया हूँ | कृपया कर मुझे इस सच से अवगत करें कि स्त्री और पुरुष में संभोग का कौन अधिक आनंद उठा पाता है ?

भीष्म ने उत्तर दिया, “पुत्र ! मैं तुम्हें भंगस्वान राजा की कथा सुनाता हूँ जिससे तुम जो जानना चाहते हो, उसको अवश्य जान पाओगे |”

भंगस्वान की कथा – पितामह ने कथा प्रारंभ की, “बहुत समय पहले की बात है कि भंगस्वान नाम का एक न्यायप्रिय और सुख-सुविधा से संपन्न राजा हर्ष से राज्य करता था | पर बस हर वक़्त उसे एक यही चिंता सताती रहती थी कि पुत्र ना होने के कारण आगे चलकर कौन मेरा राज्य संभालेगा |

किसी से उपाय ज्ञात कर उसने पुत्र-प्राप्ति की कामना से ‘अग्नीष्टुता’ नामक एक अनुष्ठान किया जिससे उसे 100 पुत्रों की प्राप्ति हुई | परन्तु राजा एक भूल कर बैठा कि यज्ञ में केवल अग्नि देव का आह्वाहन और पूजन हुआ जिससे इंद्र देव रुष्ट हो गए | अब इंद्र, राजा को इस अपराध का दंड देने का अवसर तलाशने लगे | किंतु उन्हें कोई मौका मिल ही नहीं रहा था क्योंकि भंगस्वान इतना उत्तम राजा था कि हर काम को पूर्ण सम्पूर्णता के साथ करता था, इसीलिए अब तो इंद्र का क्रोध चरम सीमा पर पहुँच चुका था |

एक दिन राजा शिकार करने हेतु वन की ओर गया और अवसर पाते ही इंद्र ने अपने अनादर का बदला ले ही लिया | असल में इंद्र ने राजा को वन में पहुँचते ही सम्मोहित कर दिया जिससे वह भटक गया और भूख-प्यास से बेचैन हो उठा | अकस्मात ही उसे एक नदी दिखाई दी, वह उसकी ओर दौड़ा और अपने अश्व को जल पिला स्वयं भी पिया | परन्तु पानी पीते ही वह क्या देखता है कि उसका रूप बदल गया है, वह एक स्त्री बन गया है | यह देखते ही राजा शर्म से पानी-पानी हो गया एवं दुखित हो विलाप करने लगा |

वह मन ही मन विचार करने लगा कि हे प्रभु ! यह अनर्थ मेरे साथ क्यों और कैसे हुआ ? अब मैं अपने राज्य में वापस क्या मुंह लेकर जाऊं ? मेरे पुत्र और महारानी से कैसे मिलूं ? क्या मेरी प्रजा मुझे स्वीकारेगी ? शोक से ग्रस्त राजा जैसे-तैसे अपने राज्य में पहुंचा |

स्त्री रुपी राजा को देख सभी लोग आश्चर्य से भर गए | इसके बाद राजा ने सभा बुलाकर मंत्रियों, रानियों और पुत्रों से कहा कि मैं इस अवस्था में राज-पाट नहीं संभाल सकता इसीलिए वन की ओर प्रस्थान कर रहा हूँ | तुम लोग यहाँ सुख से जीवन व्यतीत करो |

इतना कह राजा वन की ओर चला गया जहाँ उसने स्त्री रूप में एक तपस्वी से बहुत-से पुत्रों को जन्म दिया | जब वे पुत्र बड़े हो गए तो उन्हें साथ ले राजा रुपी स्त्री वापस राज्य में गई और अपने प्राचीन वंशजों से बोली कि यह मेरे स्त्री रूप से जन्मीं संतान हैं और तुम लोग मेरे पौरुष से उत्पन हुए हो, अतः एकसाथ मिलकर यह राज्य संभालो | भंगस्वान की ऐसी आज्ञा सुन सभी भाई प्रेमपूर्वक वैभवशाली जीवन यापन करने लगे | यह देख इन्द्रदेव को और गुस्सा आया | वे सोचने लगे इसके साथ तो अभी भी सब अच्छा हो रहा है, मुझे बदला लेने के लिए कुछ और करना होगा | इतना सोच कर वे ब्राह्मण का रूप धारण कर के पृथ्वीलोक गए और राजा के परिवार में फूट डाल दी, सभी भाइयों ने एक दूसरे को मार डाला और पूरे कुल का विनाश हो गया |

जैसे ही यह सूचना भंग्स्वाना को प्राप्त हुई वह प्रलाप करने लगी, यह देख ब्राह्मण रुपी इंद्र उसके पास गए और पूछा कि तुम रो क्यों रही हो? भंगस्वान ने पूरा वृत्तान्त सुना दिया | राजा की बात सुनते ही इंद्र अपने वास्तविक रूप में आ गए और राजा को उसकी भूल के बारे में बताया | उन्होंने कहा उस यज्ञ में मेरा अपमान हुआ था, उसी का बदला लेने के लिए मैंने यह सब किया | अपनी ग़लती जानते ही भंग्स्वाना देवराज के चरणों में गिर पड़ी और क्षमा मांगने लगी | राजा की स्थिति पर इन्द्रदेव को दया आ गई और उन्होंने माफ़ करने के साथ-साथ यह वरदान भी दिया कि उसके पुत्र जीवित हो जाएँगे |

परन्तु इंद्र ने शर्त रखी कि अपने बच्चों में से किसी एक का ही जीवनदान मांग सकते हो | यह सुन भंगस्वान ने कहा कि अगर एक ही संतान को जीवनदान मिलेगा तो आप मेरे उन बालकों को जीवित करें जिन्हें मैंने स्त्री रूप में जन्म में दिया था | इंद्र देव के कारण पूछने पर राजा ने उत्तर दिया कि मैंने स्त्री और पुरुष दोनों की जिंदगी जी है, इसीलिए मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि स्त्री का प्रेम अगाध होता है | यह सुन शचीपति इंद्र प्रसन्न हुए और उसके सभी पुत्रों को जीवन दान दे दिया |

इतना ही नहीं बल्कि प्रसन्नता के कारण इंद्र ने आगे यह भी कहा कि मैं तुम्हे तुम्हारा पूर्व रूप फिर से लौटाना चाहता हूँ, परन्तु राजा ने यह कह कर इंकार कर दिया कि मैं इसी रूप में खुश हूँ और स्त्री ही बनी रहना चाहती हूँ | इंद्र को यह सुनकर जानने की जिज्ञासा हुई कि भंग्स्वाना ऐसा क्यों कह रही हैं अतः वे पूछ ही बैठे कि क्या तुम्हारी राज्य अब कोई रूचि नहीं रही और इस निर्णय की कोई ख़ास वजह ? इस पर सामने से राजा ने उत्तर दिया कि ऐसा इसीलिए कह रहा हूँ क्योंकि स्त्री संभोग के समय अधिक आनंद उठाती है और अपनी तृप्ति के लिए ही मैंने यह निर्णय लिया है | देवराज भी प्रसन्न होकर तथास्तु कहकर अंतर्ध्यान हो गए |”

भीष्म ने युधिष्ठर को कथा संपन्न होने पर कहा, “पुत्र अब तुम्हे ज्ञात हो गया होगा कि इस दुनिया में स्त्री ही है जो आत्मीयता से सम्बन्ध बनाती है इसीलिए संभोग का भी अधिक आनंद ले पाती है |

  • तीरेसीआस की कथा –

ग्रीक मायथोलॉजी के अनुसार तीरेसीआस नामक राजा एक बार शिकार खेलने वन में गया हुआ था | वहां उसने दो विशाल सर्पों को सभोग के लिए आपस में लिपटे हुए देखा | अपनी युवा अवस्था के कारण तीरेसिआस को कुछ अजीब बात सूझी और उसने सिपोअहियों की मदद से और डंडे से दोनों साँपों को अलग कर दिया | इससे देवी हीरा क्रोधित हो गईं और उसे सात साल के लिए महिला बनने का श्राप मिला एवं उसका पौरुष नष्ट हो गया |

कुछ सालों बाद जब तीरेसीआस फिर से उसी जंगल से गुज़र रहा था तो उसने फिर वही दृश्य देखा श्राप से मुक्ति की इच्छा से और दिल जो नफरत भी भरी थी उस कारण उसने साँपों के जोड़ों को फिर संभोग की अवस्था से अलग कर दिया | इस बार ऐसा करते ही वह फिर से पुरुष बन गया |

एक बार ग्रीक देवी और उनके स्वामी ज़ीयूस में बहस चल रही थी कि स्त्री और पुरुष में से संभोग के समय कौन ज्यादा आनंदित रहता है | मात्र तीरेसीआस ही ऐसा व्यक्ति था जिसने महिला और पुरुष दोनों तरह का जीवन बिताया था | अतः निर्णय करने के लिए उसे बुलवाया गया | सवाल सुनते ही तीरेसिआस ने बिना देर किये जवाब दिया, “ स्त्री अधिक आनंद उठती है , यह आनंद और रस पुरुष से करीब 9 गुणा अधिक होता है |”

यह सुन देवी हीरा नाराज़ हो गईं और तीरेसीआस को अंधे होने का श्राप दे दिया| ज़ीयूस को लगा कि राजा को यह श्राप मेरे कारण ही मिला है, अब मैं श्राप वापस नहीं ले सकता परन्तु इसका कोई विकल्प तो सोच ही सकता हूँ | यह सोचते ही उन्होंने तीरेसीआस को भविष्यदृष्टा (भविष्य देख सकने वाला) होने का वरदान दिया |

अब आपको भी आपके प्रश्न का उत्तर मिल ही गया होगा | यह अचंभित करने वाली बात है कि दोनों कथाओं का परिणाम एक ही है, तो शायद यह तथ्य ही होगा |

संसार के हर धर्म और हर संस्कृति में ऐसे देवी-देवता हैं जो पुरुष और स्त्री का खूबसूरत रिश्ता बेहद अद्भुतता के साथ दर्शाते हैं | भारत में हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार इसका प्रतीक है अर्धनारीश्वर| शिव-पार्वती का यह स्वरुप हमें बताता है कि विवाह के पावन बंधन में बंधने के उपरान्त पति का आधा व्यक्तित्व पत्नी का एवं पत्नी का आधा व्यक्तित्व पति का हो जाता है | दोनों अपनी ऊर्जाओं को एक-दूसरे के साथ साझा करते हैं और इस शक्ति का कोई मुकाबला नहीं अर्थात स्त्री और पुरुष मिलकर ही एक सम्पूर्ण स्वरुप का निर्माण करते हैं |

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