जानें, शकुंतला के जन्म की अद्भुत कथा

शकुंतला और दुष्यंत की प्रेम कहानी से तो हम सभी परिचित हैं | कालिदास ने भी अपने काव्य अभिज्ञान शाकुंतलम में इस प्रेम को बेहद खूबसूरती के साथ दर्शाया है | पर क्या आपको पता है कि शकुंतला का जन्म किन रहस्यों से भरा है ? अगर नहीं तो हम लाए हैं आपके लिए यह लेख जो आपको शकुंतला के जन्म से सम्बंधित सारे राज़ बताएगा |

बात बहुत समय पहले की है जब महर्षि विश्वामित्र अपने कठोर तप को पूर्ण करने में लगे थे | गर्मी हो या सर्दी, बारिश हो या सूखा अपनी भूख-प्यास, नींद, आराम सब त्याग कर बस यह महान आत्मा तपस्या में लीन थी | वन में बैठे हुए ना उन्हें हिंसक जानवरों का भय सता रहा था और ना ही नदी-झरने और चिड़िया के विभिन्न स्वर उनके ध्यान में किसी तरह की बाधा उत्पन्न कर पा रहे थे | शरीर में कठोरता, चेहरे पर अनोखा तेज़ एवं दिलो-दिमाग में शून्यता उनके प्रताप के गुण गा रही थी | भला ऐसे में ऋषि की तपस्या भंग करने के बारे में सोचने की भी हिम्मत कौन जुटा सकता था|

जिस-जिस को इस कठोर तप के बारे में पता चलता वह आश्चर्य से भर जाता | अब इस बात की सूचना पहुंची देवराज इंद्र के पास और इस सूचना ने उन्हें अचंभित तो किया ही परन्तु उससे ज्यादा भय ने उन्हें घेर लिया | कहीं ना कहीं उन्हें यह डर लगना सही भी था, क्योंकि उनके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा था | दरअसल, विश्वामित्र जो तप कर रहे थे उसका उद्देश्य था एक नवीन दुनिया की रचना | अगर वे सफल हो जाते तो उस सृष्टि के जन्मदाता होने के कारण विश्वामित्र ही सर्वोपरि और पूजनीय हो जाते, इस चिंता ने इंद्र को परेशान कर रखा था |

लेकिन देवराज करते भी तो क्या करते क्योंकि विश्वामित्र की निष्ठा और घोर तप को देखकर इस तपस्या को भंग करने का कोई साहस नहीं कर सकता था | बहुत सोच-विचार करने के बाद इंद्र ने ऋषि के ध्यान को तोड़ने की युक्ति सोच ही ली और एक विस्तृत योजना बनाई | इस योजना के अनुसार इन्द्रलोक की सुन्दर अप्सराओं में से मेनका को बुलाया गया एवं शचीपति इंद्र द्वारा उसे आदेश दिए गए कि तुम्हें मृत्युलोक (पृथ्वीलोक) पर जाकर रहना होगा | इतना ही नहीं बल्कि तुम्हें एक स्त्री का रूप धारण कर अपने असीम सौन्दर्य से विश्वामित्र को मोहित करना होगा जोकि उनकी तपस्या को भंग कर देगा |

ज़ाहिर सी बात है कि इन्द्रलोक की सारी अप्सराओं में से केवल मेनका को ही इसीलिए चुना गया क्योंकि वह अत्यधिक सुन्दर, मधुर आवाज़ के साथ आकर्षण का परम शिखर थी | यह अप्सरा महर्षि के समक्ष प्रकट तो हो गई परन्तु तपस्या में पूरी तरह लीन उनके बंद नेत्रों को देख कर सोचने लगी कि विश्वामित्र के खातिर मैंने अपने अपसरा का रूप छोड़ एक नारी का शरीर अपनाया है किंतु इतने घोर तपस्वी को आकर्षित करना आसान नहीं होगा |

पृथ्वीलोक की एक सभ्य और खूबसूरत स्त्री में जो गुण होने चाहिए, वे सब अब मेनका में विद्यमान थे | मेनका की सुन्दरता का तो मुकाबला ही नहीं था लेकिन ऋषि के तप को हिला दे, इतना भी सरल नहीं था यह कार्य मेनका के लिए | अब समस्या यह भी थी कि यदि वह इंद्र के आदेश का पालन ना करे तो स्वर्गलोक में उसका क्या सम्मान रह जाएगा, वह अपना पद खोना नहीं चाहती थी | अतः वह निरंतर इस महान ऋषि विश्वामित्र को अपनी सुन्दरता के वश में करने में लगी रही |

मेनका कभी अपनी चंचल आदाओं का प्रदर्शन करती तो कभी अपनी जुल्फों और वस्त्रों को पवन के वेग से उड़ने देती, वह बार-बार उनकी आँखों के सामने आने का प्रयास करती रहती| किंतु विश्वामित्र तप की उस चरम अवस्था पर पहुँच चुके थे जहाँ यह सारी चीज़ें बेमानी मालूम पड़ती थीं, उनके बदन में किसी भी प्रकार की हलचल और मस्तिष्क में कोई भावनाएं नहीं आती थीं | पर मेनका ने भी हार नहीं मानी और एक समय ऐसा आया जब उसके रूप और संगीत ने महर्षि पर कामबाण चला ही दिया | अचानक एक दिन कामोत्तेजना इतनी तीव्र हो उठी कि वे तपस्या से उठ खड़े हुए और मेनका की ओर आगे बढ़े | अब नई सृष्टि की रचना का फैसला कहीं पीछे छूट चुका था, महर्षि का पक्का निर्णय अब टूट चुका था | झूठ ने विश्वामित्र की आँखों पर पर्दा डाल दिया था जिससे वे सच को पहचान नहीं पा रहे थे | उन्हें कुछ दिख रहा था तो बस स्त्री रुपी अप्सरा का प्रेम, अब उसे अपनी पत्नी बनाना ही उनका लक्ष्य था |

मेनका कार्य-पूर्ती की सफलता से खुश थी लेकिन उसने स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान नहीं किया क्योंकि उसे यह भय था कि महर्षि फिर से तपस्या ना शुरू कर दें | समय बीतता गया और दोनों ने एक साथ एक दूसरे के प्रेम में खोकर काफी वर्ष बिता दिए | मेनका के दिल में भी प्रेम पल रहा था लेकिन उससे ज़्यादा उसे चिंता सताती रहती थी कि इन्द्रलोक में उर्वशी और रम्भा उसकी अनुपस्थिति में कितना आनंद उठा रही होंगी | इसी चिंता में एक रात मेनका उड़कर वापस अपने लोक में चली गई | हालांकि, उसके जाने से पहले मेनका और विश्वामित्र के प्रेम से एक संतान (कन्या) उत्पन्न हुई थी जिसके जन्म के कुछ समय उपरांत मेनका उसे महर्षि के पास छोड़कर चली गई | मेनका के जाने के बाद एक बार मध्य रात्रि के अन्धकार में विश्वामित्र ने उस कन्या को कण्व ऋषि के आश्रम में छोड़ दिया |

जी हाँ ! मेनका की यही कन्या जिसे उसने विश्वामित्र के साथ मिलके जन्म दिया था “शकुंतला” के नाम से प्रसिद्ध हुई | आगे चलकर महाराज दुष्यंत और शकुंतला में प्रेम-सम्बन्ध स्थापित हुए एवं दोनों का विवाह हुआ जिससे पराक्रमी भरत का जन्म हुआ | यही वह राजा था जिसके नाम पर ही हमारे देश का नाम “भारत” प्रख्यात हुआ |

यह थी शकुंतला के जन्म की अद्भुत और अनोखी कहानी | आशा है कि शकुंतला के जन्म से सम्बंधित अब सभी प्रश्नों के उत्तर आपको मिल गये होंगे |

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