जानें यमलोक से जुड़ी कुछ आश्चर्यजनक बातें

कहते हैं कि अपने कर्मों का फल आज नहीं तो कल भोगना ही पड़ता है I परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि मनुष्य के इतने सारे कर्मों का हिसाब रखता कौन है I इसका उत्तर है- चित्रगुप्त, जी हाँ! चित्रगुप्त ही हैं जो मनुष्य के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा उसके खाते में लिखते जाते हैं I ऐसा माना जाता है कि जब मनुष्य मृत्यु को प्राप्त हो जाता है तो उसकी आत्मा को यमदूत ले जाते हैं और यमलोक की अदालत में उसे पेश किया जाता है, यहाँ निर्णायक की भूमिका और कोई नहीं बल्कि यमराज निभाते हैं I चित्रगुप्त द्वारा व्यक्ति के खाते का वर्णन किया जाता है और फिर उसके कर्मों के गणित के आधार पर यमराज निर्धारित करते हैं कि उसके साथ क्या करना है I

     हमारे हिन्दू सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार मुख्य रूप से यमराज, शनिदेव और भैरवनाथ तीन देवताओं को ही दंड देने का अधिकारी माना जाता है I मनुष्य के कर्म ही इस बात को निर्धारित करते हैं कि यमराज उसे स्वर्गलोक, नर्कलोक या पितृलोक में से कहाँ भेजेंगे, हालांकि यमराज कुछ लोगों को पुनः जन्म भी देते हैं I

     हम सब जानते हैं कि यमराज मृत्यु के देवता हैं और इसीलिए उनका नाम सुनते ही व्यक्ति थर-थर कांपने लगता है I आइये आज हम आपको यम देव से जुड़े कुछ और रोचक तथ्यों से अवगत कराते हैं :-

  • कई प्रकार के यमराज- यम, धर्मराज, मृत्यु, अन्तक, वैवस्वत, काल, सर्वभूतक्ष्य, औटुम्बर, दध्न, नील, परमेष्ठी, वृकोदर, चित्र और चित्रगुप्त- ये 14 प्रकार के यमराज हैं, जो स्मृतियों के अनुसार माने जाते हैं I “धर्मशास्त्र संग्रह” के अनुसार ऐसा भी माना जाता कि तर्पण में इन 14 यमों को उनके नाम से 3-3 अंजुलि जल देना चाहिए I
  • यमराज का नाम- यम का अर्थ होता है संयम और नियंत्रण, और जो इन गुणों पर राज करे, वह कहलाता है यमराज I धर्म और नीति की राह पर चलने के कारण यमराज को ‘धर्मराज’ भी कहा जाता है, यहाँ तक कि एक शास्त्र का नाम भी इनके आधार पर ‘यम’ ही रखा गया है I मृत्यु के देवता यमराज के लिए बहुत से विशेषण प्रचलित हैं जैसे पितृपति, कृतान्त, शमन, काल, दंडधर, श्राद्धदेव, धर्म, जीवितेश, महिषध्वज, महिषवाहन, शीर्णपाद, हरि और कर्मकर I
  • परिवार का परिवार- अब हम आपको यम देवता के परिवार से परिचित करवाते हैं I यह माता संज्ञा के गर्भ से उत्पन्न एक महान संतान है I यमराज विश्वकर्मा जी की पुत्री संज्ञा और सूर्यदेव के पुत्र हैं I भाई का नाम श्रादेवमनु और बहन पावन यमुना हैं I यमलोक के इस राजा का शास्त्र दंड तथा वाहन काला भैंसा है I मृतु देवता यमलोक में अपनी पत्नी यमी और सहयोगी चित्रगुप्त के साथ वास करते हैं I
  • दक्षिण के दिगपाल- दसों दिशाओं के अलग-अलग दिगपाल नियुक्त किये गए हैं, जो इस प्रकार हैं- इंद्र, अग्नि, यम, नऋति, वरुण, वायु, कुबेर, इश्व, अनंत और ब्रह्मा I “मार्कण्डेयपुराण” हमे बताता है कि मृत्यु के देवता यम की दिशा दक्षिण है और इसी दिशा के यह दिगपाल कहे जाते हैं I
  • यमराज का रूप- हमारे पुरानों और शास्त्रों में यमराज का रूप बहुत ही भयंकर माना जाता है I कहते हैं यम अपने विचित्र रूप में मृत्यु के समय जिस मनुष्य को दिखते हैं, वह मनुष्य डर जाता है I यमराज के रूप का वर्णन करें तो वे गहरे रंग के हैं, जो हमेशा लाल रंग के वस्त्र पहनते हैं I वे काले भैंसे की सवारी करते हैं तथा उनके हाथ में हमेशा एक गदा रहती है I
  • यमराज के मुंशी- जैसा हम ऊपर भी चर्चा कर चुके हैं कि चित्रगुप्त मनुष्य के इस धरती पर किये गए अच्छे-बुरे कर्मों को उनके खाते में लिखते जाते हैं, अतः वे ही यमराज के मुंशी कहलाते हैं I चित्रगुप्त की बही का नाम है- “अग्रसन्धानी,” जिसमें प्रत्येक जीव के कर्मों का सही-सही हिसाब लिखित है I
  • यमपुरी का वर्णन- यमराज जहाँ राज करते हैं, अब हम उस लोक के बारे में भी आपको जानकारी देते हैं I वैसे तो “गरुड़पुराण” और “कठोपनिषद पुराण” में यमलोक का विस्तृत वर्णन अवश्य मिलता है I

     मृत्युलोक के ऊपर दक्षिण दिशा में 86,000 योजन दूरी पर यमलोक की स्थिति मानी जाती है I एक योजन में करीब 4 कि.मी. होते हैं, इस प्रकार यमलोक की मृतुलोक से दूरी कुल 3,44,000 कि.मी. होती है I ऐसी मान्यता है कि मृतु के 12 दिनों के पश्चात आत्मा यमलोक का अपना खतरनाक सफ़र प्रारंभ कर देती है I पुरानों के अनुसार मानव-आत्मा बिना रुके 17 दिन तक यमपुरी की यात्रा करती रहती है तथा 18वें दिन जाकर वह यमलोक पहुँचती है I

     यदि आपने गरुड़ पुराण का श्रवण किया है तो आपको पता होगा कि इस पुराण में ‘वैतरणी नदी’ का वर्णन भी मिलता है, जो रक्त और विष्ठा से भरी होती है I वैतरणी नदी को व्यक्ति तभी आसानी से पार कर सकता है यदि अपने जीवनकाल में कभी उसने गौदान(गाय का दान) किया हो अन्यथा यमदूत उसे धक्का देते रहते हैं और आत्मा बार-बार में नदी में डूबती रहती है I

     यमलोक पहुँचने के बाद स्वच्छ जल वाली एक और नदी आती है, जिसका नाम है ‘पुष्पोद्का I’ इस नदी में सुन्दर-सुन्दर कमल के फूल खिले हैं और पास ही में एक बड़ा-सा बड़ का छायादार वृक्ष है I इसी वृक्ष के नीचे आत्मा को थोड़ी देर विश्राम करने का अवसर मिलता है और परिवारजनों द्वारा किये पिंडदान एवं तर्पण का भोजन ग्रहण कर फिर से उसमें शक्ति का संचार होता है I

     पुराणों में उल्लिखित है कि एक लाख योजन में फैली यमपुरी के चार मुख्य द्वार हैं, जिनमे से किसी एक में ही आत्मा को अपने कर्मों के अनुरूप प्रवेश मिलता है I अब हम इन चारों द्वारों का वर्णन करते हैं:-

  1. दक्षिण द्वार- दक्षिण के द्वार को ‘नर्क द्वार’ भी कहा जाता है और यम-नियम के विरुद्ध जाने वालों को कम-से-कम 100 वर्षों तक यहाँ कष्ट सहने पड़ते हैं I ऐसा माना जाता है कि इस मार्ग से वे जीव प्रवेश करते हैं जो घोर पापी होते हैं I इस द्वार का मार्ग बहुत-से हिंसक पशु जैसे शेर और भेड़िये से घिरा होता है, साथ ही आत्मा को चहुँ और फैले अत्यधिक अन्धकार और राक्षसों का सामना भी करना पड़ता है I यह मार्ग अत्यंत कष्टकारी है जो यहाँ से गुजरने वाली दुष्टात्माओं का दंड होता है I
  2. पश्चिम द्वार- अपने जीवन-काल में धर्म की रक्षा करने वाले, दान-पुण्य करने वाले और तीर्थों में प्राण त्यागने वालों को इस द्वार से प्रवेश प्राप्त होता है I यह द्वार डरावना नहीं है अपितु रत्नों से जादा हुआ है I
  3. उत्तर द्वार- उत्तर का द्वार भी नाना प्रकार के स्वर्ण जडित रत्नों से शोभा पता है क्योंकि यह उन पुण्यात्माओं का मार्ग है जिसने जीवन भर माता-पिता की सेवा की हो, सदा सत्य बोला हो और मन, कर्म व वचन से अहिंसक प्रवृत्ति का रहा हो I
  4. पूर्व द्वार- इस द्वार को ‘स्वर का द्वार’ भी कहते हैं और ये बहुत ही महँ आत्माओं को प्राप्त होता है I हीरे, मोती, नीलम और पुखराज से सजे इस द्वार में ऋषि, योगी, तपस्वी, सिद्ध-संबुद्ध आत्माओं का प्रवेश माना जाता है I उत्तर द्वार की खास बात यह है कि यहाँ से प्रवेश करते ही देव, गन्धर्व और सुन्दर अप्सराएं स्वागत करती हैं I

     यमलोक, स्वर्गलोक और नर्कलोक से अवगत होने के बाद अब समय है पितृलोक के बारे में जानने का I हिन्दू शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि पितृलोक में जाने वाली आत्माएं 1-100 वर्षों तक जन्म और मृत्यु के मध्य की स्थति का सामना करती हैं I शास्त्रों के अनुसार चंद्रलोक के उद्धव स्थान में इस लोक का स्थान माना गया है I पितृलोक में एक न्याय्दात्री समिति का गठन भी होता है, जिसके सदस्य यहाँ के श्रेष्ठ पितृ होते हैं I इस प्रकार धरती पर अपने कर्मों को भोगने के बाद दूसरे लोक में भी मानव-आत्मा को जाना पड़ता है, मनुष्य को यह ध्यान रखना चाहिए की वह अपने कर्मों को शुद्ध एवं अच्छा रखें I

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