तो ऐसे प्रकट हुए बांके बिहारी

आपने भगवान कृष्ण की अनेक कथाएँ सुनी होंगी जिनको सुनकर उनके प्रति श्रद्धा और विश्वास तो बढ़ा ही होगा, साथ ही एक अनोखी आत्मीयता का अनुभव भी होने लगा होगा | कन्हैया हैं ही इतने प्यारे कि उनकी एक छवि किसी का भी मन मोह ले | प्रभु की बालपन की लीलाएं, वीरता की गाथाएँ और गोपियों के संग रासलीला के किस्से तो हमने बहुत सुने हैं पर आज हम आपके लिए कृष्ण भगवान की एक बिल्कुल अलग ही कथा ले कर आए हैं |

राधा-कृष्ण की प्यारी जोड़ी से सम्बंधित है ये कथा जिसमें हम जानेंगे कि कैसे कृष्ण और राधा ने एक होकर अपना नवीन रूप दिखाया | यह कथा हैं बांके बिहारी की—

स्वामी हरिदास जी जो संगीत के सम्राट तानसेन के गुरु थे, वे श्री कृष्ण के परम भक्त थे| हरिदास जी ने स्वयं को ही नहीं बल्कि अपनी कला को भी सांवरे सरकार को समर्पित कर दिया था | यह प्रतिदिन वृन्दावन के निधिवन में बैठकर अपने संगीत से कृष्ण लला का मन मोह लेते थे | निधिवन को भगवान कृष्ण की रासस्थली के नाम से भी जाना जाता है |

भगवान गिरधर भी इनके संगीत के आनंदमय माहौल में खो जाते और इनके समक्ष आकर प्रकट हो जाते थे | हरिदास जी भी इतने लीन और मग्न होते थे कि प्रभु को देखते ही उनका लाड़ करने लगते थे | सभी इनके इस कृत्य से अचंभित रहते थे, अतः एक दिन इनका एक शिष्य बोल ही उठा कि हे गुरुदेव! आप तो रोज़-रोज़ अकेले ही प्रभु के दर्शन कर लेते हैं | कभी हमें इसका लाभ उठाने का अवसर प्रदान करें |

इस संवाद के उपरान्त हरिदास जी ने पुनः भजन प्रारंभ कर दिए और प्रभु भक्ति के रस में डूब गए | उनके मधुर गीत और भजन सुन कर फिर से राधा मैया और श्री कृष्ण की अविचल जोड़ी ने आकर दर्शन दिए | इस युगल जोड़ी को सामने देख स्वामी हरिदास के संगीत के स्वर कुछ बदले और अचानक गाना शुरू हुआ – “भाई री सहज जोरी प्रकट भई, जुरंग की गौर स्याम घन दामिनी जैसे | प्रथम है हुती अब हूं आगे हूं रहि है न टरि है तैसे || अंग अंग की उजकाई सुघराई चतुराई सुंदरता ऐसे | श्री हरिदास के स्वामी श्यामा पुंज बिहारी सम वैसे वैसे ||”

इसके बाद यशोदा नन्दन प्रेमपूर्वक हरिदास जी से बोले कि हम दोनों आप ही के समीप रहने के इच्छुक हैं | इसपर स्वामी जी ने विनम्रता से उत्तर दिया कि हे प्रभु ! मैं तो सन्यासी हूँ, आपको लंगोट पहना कर संतोष कर लूँगा परन्तु माता को प्रतिदिन अविरत रूप से नाना प्रकार के आभूषण किस प्रकार लाकर दूंगा | अपने भक्त के वचन सुन पहले तो कृष्ण जी मुस्काए और फिर राधा एवं कृष्ण ने एक हो विग्रह में परिवर्तित हो गए | हरिदास जी ने प्रसन्न हो इस विग्रह को प्रणाम किया और इसका नामकरण बांके बिहारी नाम से किया |

हम सभी जानते हैं कि भगवान कृष्ण हर संकट हरने वाले हैं और अगर वहीँ कोई इस बांके बिहारी स्वरुप के दर्शन और आराधना करे तो उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है | किसी भी बांके बिहारी मंदिर में इसी रूप के दर्शन मिलते हैं, बांके बिहारी यह अद्भुत रूप जिसमें कृष्ण और राधा दोनों समाए हुए हैं | बांके बिहारी की जय !

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