श्री कृष्ण को कैसे बचाया सुदामा ने श्राप से और स्वीकारी थी जीवन भर की गरीबी

 

कृष्ण और सुदामा

दो लोगों की दोस्ती में  एक अनदेखी भावना होती  है जिसमें दो लोग एक-दुसरे को भुलाकर एक-दुसरे के लिए कुछ भी करने को तैयार होते है बस एक-दुसरे की खुशी के लिए । ऐसी ही दोस्ती की मिसालों में एक नाम कृष्ण और सुदामा का नाम भी है । जो बचपन से बुढापे तक साथ थे चाहे खेल हो या फिर शैतान हरकतें ।

श्रीकृष्ण की आध्यात्मिक दृष्टि  और सुदामा की गरीबी

आज भी लोग कहते है कि सुदामा एक गरीब दोस्त था जो बचपन से लेकर जवानी पार तक गुरबत में  जीया। इस पहलू का दुसरा नजरिया  ये होगा कि सुदामा के साथ कृष्ण था जो कि किसी अमीरी से कम नहीं  है ।

कहते है कि सुदामा काफी खुद्दार किस्म का इंसान था साथ ही आध्यात्मिक भी । लेकिन इस आध्यात्मिक रंग के चलते सुदामा की जिंदगी बेरंग भी हुई, क्योंकि एक वक्त ऐसा आया जब सुदामा के पास खाने को खाना नहीं ,पहनने को कपड़ा ,चप्पल नहीं और खरीदने के लिए पैसा नहीं था ।

आज तक नहीं समझ सके कि ऐसा क्या कारण था कि कृष्ण का साथ होते हुए भी सुदामा गरीब  था क्यों सुदामा  ने कृष्ण की सहायता ली नहीं  ? चलिए जानने की कोशिश करते है  –

भगवान कृष्ण से जुडी पौराणिक कथा कृष्ण के नाम का वर्णनं

एक बार,  मेरे दादा जी बता रहे थे कि एक गरीब ब्राह्मण महिला थी  जिसकी जिंदगी  भिक्षा पर निर्भर थी तो आप आसानी से  अंदाजा लगा सकते है कि बिना भिक्षा के जिंदगी गुजारना  कितना मुश्किल साबित होगा ।  लेकिन उसकी जिंदगी एक दिन ऐसा भी आया,  जब उसे लगातार 5 दिनों तक भिक्षा  नहीं मिली ।  फिर छठे दिन मिली , वो भी दो मुट्ठी चने थे । उससे क्या होना था मेरी समझ से परे है । आज के माहौल में इसे लागू कर दें और खुद को उस महिला की जगह खड़ा कर दें तो आप अंदर से निराशा के समुंदर के साथ डूब जाएंगे , डर के अंधेरें में खो कर रह जाएंगे ।

श्याम का वक्त था

ब्राह्मणी  कुटिया पहुंची , तब तक दिन पूरी तरह से  ढल  चुका था । उसके दिमाग में ख्याल आया कि ये चने पहले कृष्ण के नाम होंगे,  उसके बाद मेरे पेट के  ।  ब्राह्मणी आध्यात्मिक तो थी ही  ।

बस ब्राह्मणी ने चनों को एक सफेद कपड़े में बांध कर रख दिया ।  भगवान कृष्ण का नाम जपते –जपते  नींद लग गई ।  नींद लगी  ही थी कि कुछ चोर चोरी करने के लिए गरीब ब्राह्मणी के घर घुस गए ।

 ब्राह्मणी की कुटिया और संदीपन मुनि का आश्रम

कुटिया में चोर धन ढूंढने  में जुट गए । तब ही एक चोर को सिक्कों से भरी एक पोटली दिखाई पड़ी । लेकिन वो बेखबर थे कि उस पोटली में धन नहीं बल्कि चने है । एक आवाज को सुनकर ब्राह्मणी की नींद  छट गई ।

अचानक से ब्राह्मणी की नींद खुल गई और हल्ला मचा दिया । शोर क्या मचा , सारे चोर  दुम दबाकर भाग निकलने लगें  । हल्ले को सुनकर गांव वाले चोरों के पीछे पड़ गए ।

चोर भागते भागते एक आश्रम में पहुंच गए , आश्रम में आसरा ले लिया । यह आश्रम  वहीं है जहां  भगवान कृष्ण और सुदामा शिक्षा ग्रहण करते थे । और  इस आश्रम का नाम संदीपन मुनि था ।

गुरुमाता दरिद्रता का श्राप श्रीकृष्ण आश्रम की साफ-सफाई

आश्रम में गुरुमाता मौजूद थी तो जैसे ही , चोर आश्रम में घुस रहे थे तब ही  चोरों ने गुरुमाता को दुसरी ओर से आते देख लिया । बस क्या था चोर जल्दबाजी में पोटली छोड़ भाग निकले ।

इसी बीच भूखी ब्राह्मणी भूख  में तड़प रही थी इसी आक्रोश में आकर ब्राह्मणी ने श्राप दे दिया । श्राप देते वक्त शब्द कुछ ऐसे थे कि जो भी पोटली के चने चखेगा वो ताउम्र दरिद्र रहेगा ।

अगले दिन तड़के  गुरुमाता आश्रम की सफाई कर रही थीं कि उन्हे वो चने की पोटली मिल गई । और इत्तेफाक  ऐसा था कि कृष्ण और सुदामा जंगल में घास काटने जाने वाले थे । तब गुरुमाता ने चने की पोटली थमा दी और कहा कि रास्तें में भूख लगे तो खा लें ।

जैसा कि उपर बताया कि सुदामा आध्यात्मिक थे  इसलिए उनको पाप ,पुण्य और श्राप की समझ काफी थी तो जैसे ही गुरुमाता ने चने की पोटली  सुदामा को थमाई, वैसे ही वो  समझ गए कि दाल में कुछ काला है मतलब चने  श्रापित है  । तो दोस्ती का फर्ज निभाते  हुए सुदामा ने कृष्ण के हिस्से के चने  तक खा लिए । साथ ही उन्हें  पता था कि अगर गलती से कृष्ण ने चने खा लिये,  तो पुरी  सृष्टि गरीब हो जानी है  इसीलिए सारे चने सुदामा ने खा लिये । इसे बोलते है  दोस्ती निभाना  , दोस्त को पता भी नहीं लगा और त्याग कर दिया ।

ऐसे करके सुदामा ने  खुद के जीवन में दरिद्रता को न्योता दे दिया ।  वासुदेव को श्राप के चंगुल से छुड़ा लिया ।

कुछ लोगों का मानना है कि ऐसा सुदामा ने इसलिए किया क्योंकि उन्हें भूख लग रही थी ।  इसलिए कृष्ण को चने का एक दाना तक नहीं दिया ।  इसलिए आज आपके सामने दुसरे और अहम पहलू को उजागर किया है जिससे सुदामा के त्याग की कहानी को समझ सकें और अपने जीवन में लागू कर सके ।

त्याग से बड़ा धर्म कुछ नहीं …….

 

No Comments Yet

Leave a Reply

Your email address will not be published.

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <s> <strike> <strong>