चाणक्य नीति के रचियता की मृत्यु आज भी है एक रहस्य

चाणक्य नीति के रचियता की मृत्यु आज भी है एक रहस्य

चाणक्य नीति के महान रचियता आचार्य चाणक्य की मृत्यु आज भी एक बड़ा सवाल है | जहाँ कई लोग यह मानते हैं कि वे किसी षड्यंत्र के शिकार हुए थे तो बहुत से तथ्य इस बात की गवाही देते हैं कि आचार्य ने स्वयं प्राण त्याग दिए थे | चाणक्य ने जिस महान ग्रन्थ की रचना की थी उसमें ऐसे बहुत से मूल मंत्र उल्लिखित हैं जो सफल जीवन के रहस्यों के बारे में बताते हैं |

चन्द्रगुप्त मौर्य को बनाया सम्राट –

मौर्य वंश – एक महान वंश, जिसकी नींव कौटिल्य यानी चाणक्य ने रखी थी | चन्द्रगुप्त एक सामान्य बालक था जिसकी माँ को धनानंद नाम के विलासिता में रहने वाले राजा ने बंदी बना रखा था | ऐसा बालक जिसे कोई जानता भी नहीं था, चाणक्य ने एक विशाल साम्राज्य उसके हाथों में सौंप दिया | आचार्य की छत्र-छाया में ही सम्राट चन्द्रगुप्त ने अपना और अपने साम्राज्य का नाम इतिहास के सुनहरे अक्षरों में लिख दिया |

अपनी रचना को कर दिया अमर –

चाणक्य ने चन्द्रगुप्त के साथ-साथ पूरे संसार को अपनी रचना द्वारा जीवन के महत्वपूर्ण सत्यों से अवगत कराया | हर उस व्यक्ति जिसने चाणक्य नीति का अध्यन किया है वह इस बात को जानता है कि चाणक्य का ज्ञान किस स्तर का था | इसी कूटनीति ने उन्हें महान राजनीतिज्ञ बनाया | उनकी रचना आज भी सब पढ़ते हैं और यह हमेशा अमर रहेगी | कुछ महत्वपूर्ण बातें जो सिर्फ चाणक्य नीति में मिलती हैं, वे आज हम आपके लिए लेकर आए हैं –

  1. अपने से अधिक शक्तिशाली व्यक्ति से बैर नहीं रखना चाहिए, जब तक हम खुद एक अच्छी स्थिति में नहीं होते | पहले सही समय आने की प्रतीक्षा करनी चाहिए और फिर एक उचित मौका पाकर आगे कदम उठाना चाहिए |
  2. ऐसे लोग जो आगे चलकर हमें भारी क्षति पहुँचाने का सामर्थ्य रखते हों, उनसे दुश्मनी करना सही नहीं होता | जैसे किसी राजा या फिर ऊंचे पद पर आसीन कोई भी अधिकारी हो, क्योंकि ये भविष्य के लिए हानिकारक सिद्ध होता है | शाशन-विरोधी गतिविधि में लिप्त रहने वाला मनुष्य हमेशा संकट ही झेलता है |
  3. शास्त्रों में भी ऐसा माना गया है कि व्यक्ति का सबसे बड़ा मित्र उसका शरीर होता है और शत्रु भी | इसीलिए ध्यान रहे कि अपनी आत्मा से कभी दुश्मनी नहीं करनी चाहिए| अपने खान-पान का ध्यान ना रखने वाला, खुद की सेवा ना करने वाला और अपना ही असम्मान करने वाला व्यक्ति कभी भी मृत्यु को प्राप्त हो सकता है |
  4. चाणक्य ने ब्राह्मण या किसी भी विद्वान पुरुष से बैर करने को भी कुल के दमन का कारण बताया है |

चाणक्य नीति नाम से प्रसिद्ध कौटिल्य का अर्थशास्त्र हमें बुद्धिमता और हिम्मत से जीना सिखाता है |

इस ग्रन्थ के रचियता को लेकर आज भी लोगों के मन में प्रश्न उठते हैं कि आखिर इनकी मृत्यु हुई कैसे | ये एक रहस्य है कि यह साजिश से की गयी हत्या थी अथवा उन्होंने खुद प्राण त्याग दिए | खैर सच क्या है, इस बात की जानकारी तो नहीं मिल पाई है परन्तु इस अद्भुत कूटनीतिज्ञ के महान कार्यों से सब परिचित हैं | इनकी मृत्यु को लेकर भी कई कहानियाँ प्रसिद्ध हैं, जिनमें से हम दो यहाँ दे रहे हैं | जहां एक कहानी यह बताती है कि आचार्य ने खुद प्राण त्याग दिए थे तो वहीं दूसरी कहानी यह कहती है कि चाणक्य के खिलाफ साजिश रची गई थी जिसके वे शिकार हुए |

मौर्यवंश की स्थापना –

कौटिल्य के नाम से प्रख्यात चाणक्य ने नंदवंश को समाप्त कर मौर्यवंश की स्थापना की और चन्द्रगुप्त को अपनी प्रतिभा पहचानने का अवसर प्रदान किया | बचपन से लेकर अंतिम सांस तक चन्द्रगुप्त ने भी चाणक्य की सलाह और सीख को सर्वोपरि माना एवं सफलता की सीढ़ी चढ़ते गए | इसी कारण उनके वंश का नाम भी इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गया | जब राजा चन्द्रगुप्त की मृत्यु हो गई तो उसके पुत्र बिंदुसार ने भी पिता की ही भांति आचार्य के उपदेशों का पूर्णतः पालन किया |

आचार्य के निर्देशानुसार चलते हुए बिंदुसार अपनी प्रजा का सुख से पालन-पोषण कर रहे थे | जहां सब इतने सुखी थे, वहां सुबंधु नाम का राजा का मंत्री आचार्य को बिंदुसार के पास देखना पसंद नहीं करता था | वह किसी भी कीमत पर चाणक्य को इनसे दूर कर देना चाहता था | वह प्रतिदिन कई षड्यंत्र और साजिशें रचता रहता था और एक दिन उसे सफलता मिल ही गई जब उसने राजन के मन में यह बात डाल दी कि उनकी माता की मृत्यु चाणक्य के कारण हुई थी | धीरे-धीरे आचार्य और राजा के रिश्ते बिगड़ने लगे और फिर एक समय आया जब बिंदुसार चाणक्य की किसी भी बात को सुनना ही नहीं चाहता था | इससे दुखित हो एक दिन चाणक्य ने महल छोड़ने का निर्णय ले लिया | उनके जाने के बाद राजा बिंदुसार की माता का ख्याल रखने वाली दाई ने सबके सामने रहस्य से पर्दा उठाया | उन्होंने बताया कि आचार्य चन्द्रगुप्त को हर प्रकार से एक सक्षम राजा बना रहे थे और इसी कारण उनके शरीर को विष का आदी बनाने के लिए रोज़ उनके खाने में थोड़ा-सा जहर मिलाते थे, इसके पीछे कारण यह था कि अगर कभी कोई शत्रु विष देकर राजा को मारने का प्रयास करे तो उसे सफलता ना मिले |

जब चन्द्रगुप्त की पत्नी ने ग्रहण किया विष –

एक दिन राजा के लिए तैयार हुआ भोजन उनकी गर्भवती पत्नी ने ग्रहण कर लिया जिससे उनका स्वास्थ्य गड़बड़ा गया | जैसे ही इसकी सूचना आचार्य तक पहुंची उन्होंने राजा के वंश की रक्षा हेतु रानी के गर्भ को काटकर शिशु को बाहर निकाल लिया | यही बालक महाराज बिंदुसार नाम से विख्यात हैं | आचार्य चाणक्य ने सदा इस वंश का भला ही चाहा लेकिन उनको बदनाम करने के लिए किसी जलने वाले ने गलत अफवाहें उड़ा दीं|

सच्चाई जानकर बिंदुसार को अपने किए पर बड़ा अफ़सोस हुआ और वे आचार्य को निर्दोष मानते हुए उन्हें मनाने पहुंचे | परन्तु चाणक्य ने वापस आने से मना कर उम्रभर उपवास का प्राण लिया और अंततः प्राण त्याग दिए | यह तो हुई पहली कहानी, अगर दूसरी कहानी की बात करें तो जब राजा महल छोड़कर चले गए तब सुबंधु ने अपने चेलों के साथ मिलकर एक साजिश रची और आचार्य को जिंदा जला दिया |

प्रत्येक शोधकर्ता अपने नए परिणामों के साथ आता है, इसीलिए आचार्य चाणक्य की मृत्यु आज भी एक रहस्यमयी सवाल बनी हुई है |

फिलहाल सच क्या है, इस बात से हम अनजान हैं लेकिन आचार्य चाणक्य जो चाणक्य नीति नामक खजाना हमारे लिए छोड़ गए हैं, उसका लाभ हम अवश्य ले सकते हैं |

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