रावण की पत्नी मंदोदरी को माँ पार्वती ने दिया था श्राप


रावण की पत्नी मंदोदरी को माँ पार्वती ने दिया था श्राप

रावण की पत्नी मंदोदरी (mandodari) थी, इस बात से तो हम सभी परिचित हैं | परन्तु आज हम आपको बताएँगे कि असल में मंदोदरी को पार्वती (mandodari) माता ने श्राप दिया था, जिस कारण वह अधर्मी रावण की धर्मपत्नी बनी | रावण की अर्धांगिनी होने का धर्म पूर्ण समर्पण भाव से निभाती थी ये खूबसूरत और पतिव्रता नारी |

  • बंद हो जाता है मंदोदरी का अध्याय –

रामायण हमारा पौराणिक ग्रन्थ है जिसकी आधी-अधूरी जानकारी के साथ ही हम खुश रहते हैं | दरअसल, कहने का तात्पर्य यह है कि जब भी रामायण की कथा का ज़िक्र आता है, तो वह राम, सीता और रावण के बीच में घूम कर ही समाप्त हो जाता है | लेकिन mandodari जैसे महत्वपूर्ण पात्र को कभी जानने और समझने की कोशिश ही नहीं की गई | क्यों हम मंदोदरी को केवल रावण की पत्नी के रूप में जानते हैं, उसकी अलग पहचान भी तो होगी | लंकेश रावण का अंत होते ही मंदोदरी के शेष जीवनकाल का अध्याय बंद हो जाता है और कहानी फिर से दूसरी ओर रुख कर लेती है |

सम्पूर्ण रामायण का अध्ययन करने के उपरान्त भी अधिकांश लोगों को यह ज्ञात नहीं होता कि मंदोदरी का जीवन कैसा रहा होगा | तो आज हम आपको बताते हैं कुछ ऐसे तथ्यों के बारे में जो आपको शायद ना पता हों |

  • मंदोदरी के जन्म की कथा –

रावण का इतिहास और मंदोदरी का इतिहास दोनों आपस में एक गहरा सम्बन्ध रखते हैं | यदि आपके मन में भी इस सम्बन्ध में जानने की उत्सुकता जन्म ले रही है, तो इसका हल हम करेंगे| दशानन रावण की मृत्यु के बाद का जीवन जानने से पहले मंदोदरी का जन्म कैसे हुआ, यह जानना आवश्यक है | तो आइये आरम्भ करते हैं मंदोदरी की कथा –

  • शिव भगवान को आकर्षित करना चाहती थी अप्सरा –

मंदोदरी के बारे में यह कथा पुराणों में भी दर्ज है | एक समय की बात है जब मधुरा नाम की एक खूबसूरत अप्सरा भ्रमण करते हुए कैलाश पर्वत पर पहुंची | Parvati devi  की अनुपस्थिति में उसने अवसर का लाभ उठाना चाहा एवं भगवान शिव को अपनी ओर आकर्षित करने में जुट गई | ऐसा करते-करते उसने शिव जी की भस्म को अपने शरीर पर भी धारण कर लिया |

शिव पार्वती के अटूट प्रेम से अनजान वह अपनी इन हरकतों में लिप्त थी कि तभी माता पार्वती का आगमन हुआ | कैलाश पर्वत पर चल रहे इस दृश्य को देख पार्वती माँ का शरीर क्रोध से कांप उठा | उसी क्षण बिना किसी विलम्ब के उन्होंने मधुरा को मेढंक बनने का अभिशाप दे दिया | इतना ही नहीं बल्कि उस श्राप के अनुसार मधुरा को मेढंक के रूप में 12 वर्ष एक ही कुएं में काटने थे |

शिव के बहुत अनुरोध करने पर पार्वती देवी ने उत्तर दिया कि मैं अपना श्राप वापस तो नहीं ले सकती किंतु बस एक उपाय बता सकती हूँ | कड़ी तपस्या करके ही यह अपना वास्तविक रूप प्राप्त कर सकती है लेकिन एक साल तक तपस्या के बाद | अब बात करते हैं मयासुर की जो असुरों का देवता था | मयासुर व उसकी पत्नी हेमा जोकि एक अप्सरा थी की एक पुत्री की कामना हुई | उनके दो पुत्र थे लेकिन फिर भी कन्या की अभिलाषा में दोनों ने तपस्या आरम्भ कर दी | इस समय तक मधुरा का तप भी पूर्ण हो रहा था |

मधुरा ने असली रूप प्राप्त कर ही लिया और फिर कुँए से बाहर आने के लिए आवाज़ लगाने लगी | उसकी करूण पुकार सुनते ही हेमा और मयासुर उसे बचाने के लिए पहुँच गए | मधुरा को पुत्री रूप में पाकर वे प्रसन्न हुए और उसका नाम मंदोदरी रख दिया |

रावण एक बार मयासुर से भेंट करने गया और मंदोदरी को देख अपने आकर्षण को रोक ना पाया | जब मयासुर के सामने उसने मंदोदरी से विवाह का प्रस्ताव रखा, तो प्रस्ताव असीकर हो गया | लेकिन रावण इतनी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं था, उसने मयासुर की पुत्री से जबरदस्ती विवाह कर लिया |

  • रावण की समर्पित पत्नी थी मंदोदरी –

मंदोदरी भी लंकापति रावण के स्वभाव और उसकी अनन्य शिव भक्ति से परिचित थी, अतः पिता व परिवार की सुरक्षा के खातिर उसने भी विवाह से इंकार ना किया | कुछ समय उपरांत मंदोदरी ने रावण से तीन पुत्रों को जन्म दिया; ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद, अक्षय कुमार एवं अतिकाय | रावण के अहंकार और बल से डरी हुई मंदोदरी को मन ही मन पता था कि रावण सर्वनाश के पथ पर आगे बढ़ चुका है | मंदोदरी का अपने पति रावण को समझाने का हर प्रयास विफल साबित हुआ | उसकी तमाम कोशिशों के बावजूद लंकानरेश सीता माता को प्रभु राम के पास लौटाने के लिए राज़ी ना हुआ |

यह जानते हुए भी कि एक श्राप के कारण रावण का वध श्री राम के हाथों होना निश्चित है, उसने युद्ध के समय पति का साथ नहीं छोड़ा | युद्ध के लिए प्रस्थान करते समय विजय तिलक कर स्वर्णपुरी की महारानी ने अपने पति के मंगल और सकुशल वापस लौट आने की कामना की|

वाल्मीकि रामायण में यह दर्ज है कि रावण के अंत के बाद भगवान राम ने लंका के कल्याण के लिए लक्ष्मण द्वारा विभीषण का राजतिलक करवा दिया | युद्ध समाप्ति के समय मंदोदरी ने रणभूमि पर पहुँच अपने सम्बन्धियों का विनाश देख दुःख प्रकट किया |

  • विभीषण से हुआ विवाह –

अद्भुत रामायण में ऐसा भी ज़िक्र मिलता है कि श्री राम ने मंदोदरी से कहा “आप स्वर्णपुरी की महारानी हैं, विभीषण से विवाह कर लंका की प्रजा का जीवन सुखमय बनाएं |” परन्तु राम जी के माँ सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ अयोध्या पहुँचते ही मंदोदरी ने स्वयं को महल के एक कक्ष में बंद कर लिया | कुछ समय बाद प्रभु की बात पर विचार कर वे बाहर आईं और विभीषण से विवाह का निर्णय ले लिया | दोनों ने लंका के साम्राज्य को उचित दिशा में बढ़ा अपना कर्तव्य पूरा किया |

 

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